आखिर मुम्बई इमारत हादसा जैसी घटनाओं का ज़िम्मेदार कौन ?

मुम्बई आसपास (कर्ण हिंदुस्तानी)
आखिर इमारतों के गिरने का ज़िम्मेदार कौन ?
बीते दिनों घाटकोपर में धाराशायी हुई इमारत का मलबा अभी उठा ही नहीं था कि गुरूवार को भिंडी बाज़ार में हुसैनीवाला नामक पांच मंज़िला इमारत ताश के पत्तों की तरह ढह गई , इस हादसे में कई लोगों की मौत हो गई और कई बुरी तरह से ज़ख़्मी हुए हैं। सरकारी यंत्रणा क्या कर रही है ? सबसे बड़ा बजट लेकर खुद पर नाज़ करने वाली मुंबई महानगरपालिका क्या कर रही है ? सरकार की डिजास्टर मैनेजमेंट योजना किस कोने में धूल फांक रही है ? इस तरह के तमाम सवाल ऐसे हादसों के बाद उठते हैं। मगर ना तो मुंबई मनपा के कानों पर जू रेंगती है और ना ही किसी भी सरकार की नींद टूटती है। मुंबई और मुंबई के उपनगरों में ऐसी कई इमारतें हैं , जिनको म्हाडा या फिर मनपा ने धोखादायक घोषित किया हुआ है। ऐसी धोखादायक इमारतों में जान मुट्ठी में लेकर रहने वालों को मौत से खेलने का कोई शौंक नहीं है। दरअसल होता यह है कि इन धोखादायक इमारतों में रहने वालों को यह डर सताता है कि इमारत के पुनर्निर्माण की स्थिति में पुनर्निर्माण करने वाला विकासक उन्हें दुबारा घर देगा भी या नहीं ? कई मामलों में देखा गया है कि विकासक ने इमारत के रहिवासियों के साथ धोखाधड़ी की है , सरकारी यंत्रणा को नोटों की हरियाली दिखाकर विकासक अपना उल्लू साधते हैं और इमारत को कमर्सिअल दाम पर बेच कर निकल जाते हैं। मुंबई मनपा और म्हाडा में बैठे दलालों की पहुँच का असर सरकारी यंत्रणा पर किस हद तक पड़ता है इसका अंदाज़ा मुंबई के विभिन्न ठिकानों पर बने हुए राहत शिबिरों में जाकर लगा सकतें हैं , इन राहत शिबिरों में बरसों से वह नागरिक रह रहे हैं जिनकी इमारतें या तो धोखादायक घोषित करवा के खाली करवा ली गई हैं या फिर इमारत गिरने की वजह से राहत शिबिर का सहारा लेने वाले रहिवासी रह रहे हैं। सरकारी यंत्रणा की ढिलाई के चलते हादसों पर हादसे होते रहते हैं , मुंबई मनपा और म्हाडा एक दूसरे पर आरोप लगाकर अपना पल्ला झाड़ते हैं , निरीह नागरिकों की सुनने वाला कोई नहीं है। इस मामले में जब तक कोई ठोस नीति सरकार तय नहीं करती तब तक इमारतें गिरती रहेंगी लोग मरते रहेंगे। इन मौतों का ज़िम्मेदार किसको ठहराया जाए इस पर भी बहस होती रहेगी , मगर नंगा सच यह है कि मनपा और म्हाडा में बैठे सत्ता धारियों तथा विपक्ष के दलाल विकासक जब तक सक्रिय हैं तब तक इसी तरह लोग कीड़े मकोड़ों की तरह मरते रहेंगे और सरकारी यंत्रणा मातम और सिर्फ मातम ही मनाएगी।

 

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