आरटीआय कानून में सम्बन्धित विभाग के दोषी अधिकारियों पर कारवाई का प्रावधान गौण क्यों.??

(कर्ण हिन्दुस्तानी)

अन्ना हजारे ने जब सूचना का अधिकार के लिए लड़ाई शुरू की थी और इस कानून को पारित करवाने अनेको दिन अनशन कर काटे थे. तो  उन्हें अंदाजा नहीं रहा होगा कि इसका गलत इस्तमाल ज्यादा होगा.और कुछ लोग इसे भी महज झोल करने का जरिया बना लेंगे.सबसे अजीब बात इस कानून में ये है की जो विभाग इस सूचना के अधिकार के तहत आवेदनकर्ता को पूरी जानकारी मुहैया कराता है उसे अपने विभाग की खामिया की पूरी जानकारी रहती है.और वही विभाग  इन खामियों का जिम्मेदार भी रहता है. बावजूद इसके इन अनियमितताओं को दूर करने के सम्बन्धित विभाग इन खामियों को आवेदन कर्ताओं को उपलब्ध करवा देती है.परिणाम स्वरुप सेटलमेंट और झोल होना स्वभाविक है.अगर सूचना के अधिकार के तहत दोषी पाए जाने वाले विषय में सर्व प्रथम दोषी पाए गए सम्बन्धित विभाग के अधिकारी पर कड़े करवाई के प्रावधान हो तो इस कानून की सार्थकता साबित होगी

अक्टूबर २००५ से पारित सूचना के अधिकार कानून के देश भर में लाखो आरटीआय कार्यकर्त्ता बन गए है.हर रोज इनके नए नए खुलासे सामने आते है लेकिन दुसरे दिन इसी विषय पर कुछ नया या इसके परिणाम पर खबर कम ही दिखाती है. यहा खबर क्यों रुक गयी इस पर लिखने से अच्छा समझ जाना ही वेहतर होगा.क्योकि यहाँ आरटीआय कानून का इस्तमाल सिर्फ झोल करने के लिए ही हुआ था.इस कानून में अगर सम्बन्धित विभाग के गैर जिम्मेदार और भ्रष्ट अधिकारियो पर सर्वप्रथम कारवाई के प्रावधान हो और इसका कड़ाई से पालन हो तो धीरे धीरे ही सही इन विभागों में अनियमितता कम होती जायेगी.

ताज़ी घटना कल्याण के एक केवल समाचार की प्रमुख महिला पत्रकार को ठाणे हप्ता विरोधी पथक ने रविवार सुबह एक भवन निर्माता की शिकायत पर गिरफ्तार किया है.शिकायत कर्ता भवन निर्माता सुरेन्द्र पाटिल का आरोप है की महिला पत्रकार ने उनके निर्माणाधीन इमारतों की सूचना के अधिकार के तहत जानकारी निकाली थी और उसी आधार पर उन्हें ब्लैकमेल करते हुए ५ लाख रूपये की मांग की थी जिसमे २ लाख रूपये भवननिर्माता पाटिल ने महिला पत्रकार को दिए भी थे.

अब सवाल उठता है की भवन निर्माता ने अपने निर्माणाधीन इमारतों में ऐसी क्या अनियमितता बरती है जिसके कारण कोई उनसे ५ लाख रुपये हफ्ता मांग रहा है. और वे २ लाख दे भी देते है भवन निर्माता द्वारा २ लाख रुपये पहले देना पूरी तरह से मामले में गड़बड़ी दिखता है.

ये भवन निर्माता सुरेन्द्र पाटिल वही है जिन पर १५ दिन पूर्व ही डा. बाबा साहेब आंबेडकर के बारिसदारो ने अपने पूर्वजो की जमीन हडपने का आरोप लगाते हुए यहाँ के मानपाडा पुलिस थाणे में धारा ४२० के तहत मामला दर्ज किया था.इनकी शिकायत पर पुलिस जागी वो ठीक है.

लेकिन क्या यही पुलिस की जिम्मेदारी डा आंबेडकर के बारिसदारो को भी न्याय दिलाने की नहीं है ???

सूचना के अधिकार के तहत अगर मनपा प्रशासन को भवन निर्माताओ के निर्माणाधीन कार्य में कुछ गलत दिखता है तो उस पर कारवाई होनी चाहिए. लेकिन यहाँ प्रशासन सिर्फ अपनी जेबे भर के चुप्पी साधे बैठे रहता है.

 

Please follow and like us:
error

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Please wait...

Subscribe to our Newsletter

To get Notified of our weekly Highlighted News. Enter your email address and name below to be the first to know.
error

Enjoy this blog? Please spread the word :)

Facebook
Twitter
YouTube
Follow by Email