उपचुनाव नतीजों के मायने: 2019 के लिए बीजेपी को बनानी होगी नई रणनीति

लोकसभा उपचुनावमें हार के बाद अब भाजपा के हाथ से कैराना सीट भी निकल गई है। इससे पता चलता है कि 2019 आम चुनाव में भाजपा विपक्षी दलों की एकता को हल्के में नहीं ले सकती और उसे फिर से केंद्र की सत्ता पाने के लिए बिल्कुल अलग रणनीति बनानी होगी। हालांकि पार्टी को यह भी लगता है कि विपक्ष की एकजुटता से मोदी बनाम अन्य पर जितनी भी चर्चा होगी वह उसके लिए फायदे का ही सौदा होगी।

लोकसभा उपचुनाव में जितने बड़े अंतर से भाजपा की हार हुई है, उससे स्पष्ट हो गया है कि विपक्ष अपने साझे उम्मीदवार को वोट ट्रांसफर करने में सफल रहा है। कैराना से आरएलडी के टिकट पर समाजवादी पार्टी की नेता तबस्सुम हसन ने 44,618 वोटों के अंतर से भाजपा की मृगांका सिंह को हराया। जाट समुदाय की मृगांका को पिता हुकुम सिंह की मृत्यु होने के बावजूद सहानुभूति वोट नहीं मिले क्योंकि जाटों ने मुसलमानों के साथ मिलकर आरएलडी के पक्ष में वोट डाला। चुनाव में विपक्ष के वोट पर्सेंटेज को मिलाने जैसा सामान्य गणित काम नहीं करता, लेकिन भाजपा को इस सच्चाई का अहसास हो गया है कि जातीय आधार पर वोटिंग हुई तो उसका विपक्ष के सामने टिकना मुश्किल हो जाएगा।

उत्तर प्रदेश में 2019 लोकसभा चुनाव में एसपी, बीएसपी, कांग्रेस और आरएलडी मिलकर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं। ऐसी अटकलें लगाई जा रही हैं कि 2019 आम चुनाव में भाजपा ध्रुवीकरण करने की कोशिश करेगी ताकि लोग जाति के बजाय धर्म के आधार पर वोट डालें। इसलिए लोकसभा चुनाव में हिंदूवादी और यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का नेतृत्व, राम मंदिर, मुजफ्फरनगर दंगे, गोवध और बूचड़खानों को बंद कराने जैसे मुद्दे पार्टी जोरशोर से उठा सकती है। ध्रुवीकरण से भाजपा को हमेशा फायदा हुआ है, लेकिन इसके जरिये लगातार चुनावी फायदे लेना मुश्किल है।

2014 में हिंदू-मुस्लिम के बीच दरार से भाजपा को खासतौर पर यूपी में काफी फायदा हुआ था, जो 2017 के विधानसभा चुनाव तक जारी रहा। विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने ‘श्मशान बनाम कब्रिस्तान’ और बीफ जैसे मुद्दे उठाए थे। यूपी में फूलपुर, गोरखपुर और अब कैराना, राजस्थान में अलवर और अजमेर सीट के बीजेपी के हाथ से निकलने और बिहार में अररिया जैसी सीट पर हार के बाद बीजेपी हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण की कोशिश कर सकती है। उसे जेडीयू और शिवसेना जैसी सहयोगी पार्टियों से भी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

भाजपा के सहयोगी भी अब उसके लिए राह कठिन कर रहे हैं। भाजपा ने पालघर और भांदरा-गोंडिया उपचुनाव के लिए शिवसेना के साथ गठबंधन की कोशिश की थी, लेकिन उद्धव ठाकरे अपना रुख नरम करने को तैयार नहीं हैं। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह भी कह चुके हैं कि भाजपा और शिवसेना को अगला लोकसभा चुनाव मिलकर लड़ना चाहिए। यह मामला दिलचस्प है क्योंकि दोनों पार्टियां महाराष्ट्र में मिलकर गठबंधन सरकार चला रही हैं और केंद्र की गठबंधन सरकार में भी शिवसेना शामिल है।

उधर, बिहार में जेडीयू भी इस बात के संकेत दे रही है कि वह एनडीए में रहने के अपने नफा-नुकसान का आकलन कर रही है। जेडीयू को हालिया जोकिहाट उपचुनाव में हार मिली है जबकि अरररिया लोकसभा सीट भी वह नहीं जीत पाई थी। ऐसा इसलिए क्योंकि एनडीए के साथ रहते हुए उसे मुस्लिम वोट नहीं मिले।

हालांकि झटके को कमतर साबित करने के लिए बीजेपी के केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद का कहना है कि उपचुनाव इस बात का पैमाना नहीं होते कि लोकसभा चुनाव कौन जीतेगा। केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने भी कहा है कि अच्छी छलांग के लिए कुछ कदम पीछे भी लेने पड़ते हैं। बीजेपी के एक नेता का कहना है कि अगले लोकसभा चुनाव में किसकी जीत होगी यह पैन इंडिया फैक्टर्स से तय होगा। उनके मुताबिक विपक्ष मोदी बनाम अन्य की लड़ाई का जितना शोर मचाएगा उतना ही भाजपा को फायदा होगा।

Please follow and like us:
error

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error

Enjoy this blog? Please spread the word :)

Facebook
Twitter
YouTube
Follow by Email