गीता का ज्ञान शायद भूल गए देवगौड़ा,अपने अच्छे बुरे कर्मो का फल यही भुगतना है.

राजेश सिन्हा

कहानी वर्ष 1996 की है गुजरात में भारतीय जनता पार्टी के 182 में से 121 विधायको के समर्थन वाली सरकार थी. देश के प्रधानमंत्री पद पर एचडी देवगौड़ा विराजमान थे गुजरात में सुरेश मेहता मुख्यमंत्री थे जबकि भाजपा गुजरात प्रदेश अध्यक्ष पद पर वजुभाई वाला थे जो कि अभी कर्नाटक के राज्यपाल हैं

उस दौरान कांग्रेस तात्कालीन भाजपा नेता शंकर सिंह वाघेला को मुख्यमंत्री पद का प्रलोभन देकर भाजपा से बगावत करने को उकसाया था मुख्यमंत्री की कुर्सी मिलने के लालच में शंकर सिंह वाघेला ने अपने साथ के कथित 40 विधायकों को लेकर भाजपा के विरोध में खड़े हो गए

उस दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री देवगोडा से तत्कालीन लोकसभा के विरोधी दल नेता अटल बिहारी वाजपेई के साथ एक प्रतिनिधिमंडल ने मुलाकात की थी और गुजरात में भाजपा को पूर्ण बहुमत होने का दावा किया था इस प्रतिनिधिमंडल में तात्कालीन गुजरात प्रदेश भाजपा अध्यक्ष वजुभाई वाला भी थे उस बैठक में देवगौड़ा ने अटल बिहारी वाजपेई को गुजरात में कोई भी गलत कार्रवाई नहीं करने का पूरा आश्वासन दिया था

१८ सितम्बर को गुजरात विधानसभा में तात्कालीन भाजपा मुख्यमंत्री सुरेश मेहता ने सदन में विश्वास प्रस्ताव वहुमत से जीत लिया था. बावजूद इसके अगले दिन ही यही देवगोडा ने बिना उचित कारण बताये कांग्रेसियों के दवाव में आकर गुजरात सरकार वर्खास्त करने की अनुशंसा तात्कालीन राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा से कर दी. केंद्र सरकार की अनुशंसा पर राष्ट्रपति ने गुजरात की भाजपा सरकार बर्खास्त कर दी और वहां 19 सितंबर 1996 को राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया
उस दौरान रातों रात भाजपा की तरफ से राष्ट्रपति भवन में गुजरात के भाजपा विधायकों का परेड भी कराया गया बावजूद इसके कही से कोई सुनवाई नहीं हुई और राज्य में राष्ट्रपति शासन से महज 34 दिन बाद शंकर सिंह वाघेला को राज्यपाल कृष्णपाल सिंह ने मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के लिए आमंत्रित कर दिया 24 अक्टूबर 1996 को वाघेला ने कांग्रेस के समर्थन से गुजरात के मुख्यमंत्री की शपथ ली।

उसी दौरान भाजपा  नेता अटल बिहारी वाजपेई ने सरेआम पत्रकार परिषद में तत्कालीन प्रधानमंत्री एच डी देवगौड़ा द्वारा धोखेबाजी करने का आरोप लगाया था  शायद देवगोडा को वो पुराना वाकया जरूर याद आया होगा जब सबकुछ भाजपा के पक्ष में था फिर भी सिर्फ राजनीतिक फायदे के लिए उस दौरान देवगोडा ने गलत फैसला लिया था

कर्नाटक विधानसभा चुनाव में भाजपा कांग्रेस और जनतादल सेकुलर तीनो दल अलग अलग चुनाव लडे.इनमे भाजपा २२२ में से १०४ सीटें जीत राज्य की सबसे बड़ी पार्टी है ऐसे में भारतीय संविधान क्या कहता है ?.और अपने 42 साल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मे तपे पले बढ़े कर्नाटक के राज्यपाल वजुभाई वाला से गलत निर्णय करवाना किसी के भी बस में नहीं है

तिलमिलाई कांग्रेस ने वुधवार को आधी रात को माननीय सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया लेकिन वहा भी वही निर्णय हुआ.जो अपेक्षित था.सुप्रीम कोर्ट ने भी राज्यपाल वजूभाई वाला के राज्य के सवसे बड़ी पार्टी को सबसे पहले सरकार वनाने के लिए आमंत्रित करने के फैसले को सही ठहराया.और इसे संवैधानिक मानते हुए राज्यपाल के निर्णय में कोई हस्तक्षेप नही करने निर्णय सुनाया.माननीय सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से एक और बात साफ़ हो गयी की केंद्र में सत्ता में होने के बावजूद कांग्रेसियों की तरह भाजपा सरकार अपने पहुच का गलत फायदा नही उठा रही है.जो भी हो रहा है संविधान के तहत हो रहा है.

हा इस फैसले से देवगौड़ा और कांग्रेस अपने पुराने पापो को याद कर अफ़सोस जरुर कर सकती है.और शायद जनतादल सेकुलर और कांग्रेस के मुख्यमंत्री के सयुक्त उम्मीदवार  देवगोडा के पुत्र एच डी कुमारस्वामी भी मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुच कर कुर्सी छीन लिए जाने के लिए अपने पिता के बुरे कर्मो को ही दोषी मन रहे होंगे.

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