धार्मिक प्रतीकों की सात्त्विकता बढने से उसका भक्तों की साधनायात्रा पर सकारात्मक परिणाम होता है – मिलुटिन पैनक्रेट्स

प्रत्येक प्रतीक अथवा चिन्ह से सूक्ष्म स्पंदन प्रक्षेपित होते हैं । यह स्पंदन सकारात्मक अथवा नकारात्मक हो सकते हैं । अधिकांश लोग अपने धर्म के प्रतीकों से प्रक्षेपित स्पंदनों के संदर्भ में अनभिज्ञ होते हैं । इसलिए उनके धार्मिक प्रतीकों से नकारात्मक स्पंदन प्रक्षेपित हो रहे हों तो उसका उन्हें बोध नहीं होता । ऐसे नकारात्मक स्पंदनों का भक्तों पर अनिष्ट परिणाम हो सकता है । भक्तों की अपने धर्म के प्रतीकों पर श्रद्धा होती है । इस श्रद्धा के कारण उनकी आध्यात्मिक उन्नति को गति मिलती है । धार्मिक प्रतीकों की सात्त्विकता में वृद्धि हो, इस दृष्टि से प्रयास करने पर उसका भक्तों की साधना पर सकारात्मक प्रभाव पडता है,

यह विचार महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय के मिलुटिन पैनक्रेट्स ने व्यक्त किया । वे, ‘यूरोपियन अकेडमी ऑफ रिलीजन’ के वर्ष २०१९ में आयोजित वार्षिक सम्मेलन में भाषण कर रहे थे । यह अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन इटली देश के बोलोने नगर में हुआ । ४ से ६ मार्च तक चले इस सम्मेलन में ६ मार्च को यह शोधनिबंध प्रस्तुत किया गया । मिलुटिन पैनक्रेट्स ने सम्मेलन में ‘धार्मिक प्रतीक और उनके सूक्ष्म-प्रभाव का अध्यात्मशास्त्र’ यह शोधनिबंध प्रस्तुत किया । महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय के संस्थापक परात्पर गुरु डॉ. आठवले इस शोधनिबंध के लेखक, तथा पू. रेंडी इकरान्टिओ और श्री. शॉन क्लार्क इसके सहलेखक हैं ।

मिलुटिन पैनक्रेट्स ने कहा कि धार्मिक प्रतीक विविध रूप में हो सकते हैं ।  इसमें वस्त्र, प्रतीक, प्रतिमा, नाद इत्यादि अंतर्भूत हो सकते हैं । मूलतः धार्मिक प्रतिक कलात्मक चिन्ह होते हैं । भक्तों को ईश्‍वर से जोडने में सहायता करना उनका प्रमुख कार्य है । अर्थात धार्मिक प्रतीकों में सात्त्विकता ग्रहण करने तथा नकारात्मकता को वापस लौटाने की क्षमता होना आवश्यक है । परंतु तटस्थता से देखने पर सभी धार्मिक प्रतीक इन मानदंडों की पूर्तता करते हैं क्या ? इसका अध्ययन करने के लिए महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय के आध्यत्मिक अनुसंधान करने वाले गुट के सूक्ष्म स्पंदन जानने की क्षमता रखनेवाले सदस्यों ने विविध धार्मिक प्रतीकों में सूक्ष्म स्पंदनों का परिक्षण किया । साथ ही इन सभी धार्मिक प्रतिकों का अभ्यास भूतपूर्व अणू वैज्ञानिक डॉ. मन्नम मूर्ति ने विकसित किया है, जिसके अनुसार ‘यूनिवर्सल थर्मो स्कैनर’ और ‘पालिकान्ट्रास्ट इंटरफेरन्स फोटोग्राफी’ इस आधुनिक प्रभावमंडल और ऊर्जा नापने के यंत्र और प्रणालियों के माध्यम से भी किया गया । इस अनुसंधान से आध्यात्मिक और धार्मिक प्रतीकों के संदर्भ में कुछ मूलभूत सूत्रे ध्यान में आईं ।

अ. किसी भी प्रतीक से संबंधित विशेष सूक्ष्म स्पंदन कार्यरत होते हैं । इन स्पंदनों का विभाजन उच्च सकारात्मक, सकारात्मक और नकारात्मक इस प्रकार कर सकते है । ऐसा ध्यान में आया है कि अध्ययन किए गए कुछ धार्मिक प्रतीकाेंं में कुछ प्रतीक अन्यों की तुलना में अधिक सकारात्मक होते हैं । इसके अतिरिक्त एक प्रतीक की आध्यात्मिक उपयुक्तता पर बहुत प्रमाण में प्रभावित करनेवाली अन्य आध्यात्मिक विशेषताएं भी ध्यान में आईं ।

आ. एक धार्मिक प्रतीक का सात्त्विक होना स्पष्ट होने पर उसकी सात्त्विकता प्रयासपूर्वक बढाने में आध्यात्मिक अनुसंधान करनेवाले गुट को यश मिला । किसी प्रतीक में जितनी सात्त्विकता अधिक उतना उस प्रतीक के संपर्क में आनेवाले व्यक्ति पर सूक्ष्म का परिणाम अधिक होता है ।

इ. किसी देवता तत्त्व से संबंधित विविध प्रतीकों की (उदा. किसी देवता का चित्र, यंत्र और रंगोली) सूक्ष्म विशेषताएं एक जैसी ही होती हैं ।

ऐसे प्रयोगों से एक दैवी तत्त्व के अलग-अलग आकार के प्रतीकों की आध्यात्मिक समानता (सूक्ष्म ऊर्जा के स्तर पर विशेषताएं) स्पष्ट होती है । यह, उन प्रतीकों का संबंध एक ही दैवी तत्त्व से होने के कारण होता है । इसलिए कलात्मक स्वतंत्रता का प्रयोग कर किसी धार्मिक प्रतीक में कलात्मक परिवर्तन करने से पूर्व कलाकारों को बहुत सावधानी लेना आवश्यक है अन्यथा उसके दूरगामी परिणाम समाज को भोगने पड सकते हैं, ऐसा ध्यान में आया है

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