पितृपक्ष में विधि विधान से किया गया श्राद्ध कर्म फलदायी होता है : शर्मा

श्राद्ध कर्म में साधन संपन्न कंजूसी न करें
(शीतला प्रसाद सरोज)
मुंबई। प्रसिद्ध वास्तुशास्त्री पं अशोक शर्मा ने कहा कि पितृपक्ष में विधि विधान से किया गया श्राद्ध कर्म व्यक्ति को सफलता दिलाता है और फलदायी होता है।
अँधेरी (पू.) के नागरदास रोड स्थित गोवर्धननाथ की हवेली में ‘पितृपक्ष में श्राद्ध कर्म’ विषय पर आयोजित परिचर्चा पं अशोक शर्मा ने कहा कि पितरों के प्रति श्रद्धा व प्रेम प्रगट करने के सबके अपने अलग/अलग तरीके हो सकते हैं। सनातन धर्म के अनुसार श्राद्ध पक्ष में पितरों को याद कर कुछ विशेष क्रियाओं द्वारा धन्यवाद का भाव प्रगट किया जाता है।
श्राद्ध को परिभाषित करते हुए कहा जा सकता है – “श्रद्धार्थमिदं श्राद्धम्”, अर्थात – अपने मृत पितृगण के प्रति श्रद्धा पूर्वक किये जाने वाले कर्म को श्राद्ध कहते हैं, जिससे पितरों से आशीर्वाद प्राप्त होता है और भौतिक सुख-सुविधाओं के लिए किये गए प्रयत्न सार्थक होने लगते हैं।
पौराणिक ग्रंथों के अनुसार-
आयुः प्रजां धनं विद्यां स्वर्गं मोक्षं सुखानि च ,
प्रयच्छन्ति तथा राज्यं पितरः श्राद्धतर्पिता।
व्यवहारिक जीवन में देखा जाता है कि किसी पारिवारिक समारोह में जब घर का छोटा बच्चा किसी से कुछ वस्तु भेंट में पाता है तो ऐसी दशा में हम उससे आशा करते हैं कि वह उपहार देने वाले के प्रति धन्यवाद ज्ञापित करे। यदि बच्चा ऐसा नहीं करता और उपहार लेकर चला जाता है तो लोगों के सामने बड़ी ग्लानि महसूस होती है।
नीति के ग्रन्थ भी कहते हैं –
तिल मात्रं अप्युपकारम् शैलवन् मन्यते साधुः
अर्थात – सज्जन और साधु व्यक्ति तिल जैसे छोटे से उपकार को भी शिला (पहाड़) की तरह मनाते हैं।
धन्यवाद शब्द परिवार तथा समाज में एकता और प्रेम को बढाता है। पितरों और माता/ पिता के कारण ही तो हमें जीवन तोहफे के रूप में मिला है। वर्ष में एक बार पितृपक्ष में पूर्वजों की मृत्यु तिथि को जल, तिल, यव, कुश और पुष्प से तर्पण करना तथा उनकी आत्मा की शान्ति के लिए गोग्रास (गाय को घास खिलाते हुए) देते हुए एक से तीन या पांच ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए। श्राद्ध कर्म में साधन संपन्न व्यक्ति को कंजूसी नहीं करनी चाहिए।
शास्त्रों में श्राद्ध करना अनिवार्य कहा गया है। यहाँ तक की जो व्यक्ति निर्धन या गरीब है, उसके लिए भी श्राद्ध करने का विधान है। वह शाक से पूर्वजों का श्राद्ध कर सकता है। श्रद्धा के साथ अगर वह गाय को घास भी खिलाता है तो मान लिया जाता है कि उसने अपने पूर्वजों का विधि विधान पूर्वक श्राद्ध कर दिया। कुछ लोग शाक भी गाय को खिलाने में असमर्थ हो सकते हैं, ऐसे में उनके लिए कहा गया है –
न में अस्ति वितं न धनं च नान्यच्, श्राद्धोपयोग्यं स्वपितृन्नतोस्मि,
तृप्यन्तु भक्त्या पितरो मयैतौ कृतौ भुजौ वर्त्मनि मारुतस्य ।
अर्थात- हे मेरे पितृ गण ! मेरे पास श्राद्ध के उपयुक्त न तो धन है न धान्य आदि। अतः शास्त्र में बताये गए विधान के अनुसार एकान्त स्थान पर बैठ कर मैंने श्रद्धा और भक्ति से अपने दोनों हाथ आकाश कि ओर उठा दिया है। कृपया आप मेरी श्रद्धा और भक्ति से ही तृप्त हो जाइये।
कहने का आशय है कि आर्थिक और व्यावहारिक कारणों वश पितरों के तर्पण के लिए बताये गए तरीकों को जो करने में असमर्थ हैं, वे भी इस प्रकार से अपने पूर्वजों का श्राद्ध कर सकते हैं। पितृपक्ष में विधि विधान से किये गए श्राद्ध कर्म से व्यक्ति को सफलता मिलती है।

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