बोगस पत्रकार और पत्रकारिता

(कर्ण हिन्दुस्तानी )

पूरे देश में पत्रकारिता ही एक ऐसा पेशा है जिसमें सबके सब अंदरूनी रूप से निजी तरह से सताए हुए हैं लेकिन समाज को दिखाने के लिए पत्रकार खुद को दुनिया का अलग प्राणी समझते हैं .एकता का अभाव होने के कारण पत्रकारों को कोई भी नेता अथवा समाज  कंटक भी गाल पर थप्पड़ मार कर चला जाता है . जब भी किसी पत्रकार पर कोई मामला दर्ज होता है तो सबसे पहले कुछ कम्पुबाज़ पत्रकार बिलबिलाने लगते हैं , अपने ही समाज के खिलाफ अदालती आदेश आने के पहले ही पत्रकार को दोषी ठहराने में पत्रकारों का एक ग्रुप सक्रिय हो जाता है . कुछ पत्रकार तो कथित रूप से पत्रकार के खिलाफ शिकायत करने वाले शिकायतकर्ता के पास जाकर उसे बधाई देतें हैं कि आपने बहुत अच्छा कार्य किया .सामने वाला पत्रकार तो बोगस है , किसी बड़े पब्लिकेशन के यहाँ नौकरी करने वाले पत्रकार स्थानीय समाचार पत्रों के मालिकों को अपने से छोटा समझते हैं , जबकि सच्चाई तो यह है कि बड़े अखबारों में उपसंपादक को मस्का मार कर यह पत्रकार अपनी खबरें प्रकाशित करवाते हैं . आज इन पत्रकारों की खबर प्रकाशित होती है तो कल का भरोसा नहीं कि कल यह पत्रकार उसी अखबार में होगा या फिर निकाल दिया जाएगा

.लघु उद्योग की तर्ज पर निकलने वाले अखबारों को बड़े पब्लिकेशन में काम करने वाले पत्रकार अपने पैरों की जूती समझते हैं .कल तक जिस पत्रकार को पत्रकार संघ के मंच पर देखा जाता है और मनपा में पत्रकार कक्ष में बैठे और खबरें लिखते देखा जाता था , उस पत्रकार पर मामला दर्ज होते ही बाकी के पत्रकार उसे अपनी बिरादरी से निकाल कर बाहर कर देने की होड़ में लग जातें हैं.और उसे जोर जोर से चिल्ला कर बोगस पत्रकार भी कहने लगते है.जैसे बाकी के पत्रकारों ने कभी किसी से नजराना लिया ही नहीं होता है .जब कोई पत्रकार खुलेआम पत्रकारों के लिए आयोजित कार्यक्रमों में हिस्सा लेता है तब वह बोगस नहीं होता , मगर जैसे ही उस पत्रकार पर कोई मामला दर्ज किया जाता है तो वह पत्रकार बोगस हो जाता है .वाह री पत्रकारिता और पत्रकार .

 

पत्रकारिता को समाज का आइना समझने वाले पत्रकारों की आज सही मायने में भारी कमी है .खुद को दिग्गज पत्रकार समझने वाले पत्रकारों को वह पत्रकार बोगस नज़र नहीं आते हैं जो ममता बेनर्जी के साथ विदेश में जाकर होटल से चम्मच चोरी करते हैं और पकडे जाने पर पचास – पचास पौंड जुर्माना भरते हैं .ऐसे चम्मच चोर पत्रकारों के मातहत काम करने वाले पत्रकारों की मानसिकता क्या होगी इसको समझाने की ज़रूरत ही नहीं है .बात यह नहीं है कि पत्रकार हफ्ता वसूली कर ही नहीं सकता , सभी जानते हैं कि पत्रकारिता में आज की तारीख में कुछ धन पशु घुस आये हैं जिनका काम ही है रोज़ शाम को एन केन प्रकारेण हज़ार रुपया घर पर लेकर जाना ही है .अपने वरिष्ठों को खुश रखने के लिए कई अंश कालीन संवाददाता नीचता की हर सीमा पार कर जाते हैं .जबकि कुछ पत्रकार आज भी पत्रकारिता के सभी मापदंडों का पालन करते हुए पत्रकारिता कर रहे हैं .इसी वजह से पत्रकारिता थोड़ी सी जीवित है .ज़रूरत है पत्रकारों को अपनी गिरेबान में झाँकने की .

भाई एक बात हमारे बीच के पत्रकार पर कारवाई का.

इन बातो का हमें समर्थन तभी करनी चाहिए जब हम उस पत्रकार जैसा कोई कुकर्म नहीं कर रहे हो. या वो पुलिस कर्मी ये करवाई पूरी करे जिसने हराम के पैसो से अपने बच्चो और परिवार की खुशिया नहीं बाटी हो.वरना इन सब की स्थिति तो “इस हमाम में सब नंगे है”जैसी है.इनकी क्या औकात की हम पत्रकारों पर कारवाई करे.

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