भारत की आज़ादी का कड़वा सच (भाग – १७ )

(कर्ण हिंदुस्तानी )
भगत सिंह द्वारा खुद को ना बचाना और अपने आपको भारत की आज़ादी के लिए न्योछावर कर देने की भावना ने देश के युवाओं में नयी चेतना जगा दी। १० जून १९२९ वाले दिन तक मामले की सुनवाई चलती रही। भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त के प्रति ब्रिटिश हुकूमत का रवैया तनिक भी दरियादिली वाला ना था। १२ जून १९२९ वाले दिन दोनों को आजीवन कारावास की सजा सूना दी गई। सजा सुनाने के पश्चात बटुकेश्वर दत्त को लाहौर और भगत सिंह को मियाँ वाली जैन के लिए रवाना कर दिया गया। दोनों को एक ही बोगी  में जेल ले जाया जा रहा था। दोनों भले ही एक ही बोगी  में थे मगर दोनों का डिब्बा भिन्न था। दोनों ने ज़ोरदार तरीके से रामप्रसाद बिस्मिल की अजर अमर पंक्तियों को गाना शुरू कर दिया।
मेरा रंग दे बसंती चोला 
मेरा रंग दे बसंती चोला ,
इसी रंग में रंग शिवा ने 
माँ का बंधन खोला 
मेरा रंग दे बसंती चोला ,
यही रंग हल्दी घाटी में 
खुलकर के था खेला ,
नव बसंत में भारत के 
हित वीरों का यह मेला ,
मेरा रंग दे बसंती चोला 
मेरा रंग दे बसंती चोला। 
 
वैन में साथ चल रहे पुलिस कर्मी सार्जेंट दोनों की इस मस्ती को देख कर हैरान थे। यकायक एक स्टेशन पर ट्रेन रूक गई। सार्जेंट ने भगत सिंह को कहा तुम दोनों के हाथ बंधे हैं , तुम तक गए होंगे , कुछ देर आराम कर लो।  भगत सिंह ने तपाक से जवाब दिया। जिसकी माँ गुलामी की ज़ंजीरों में जकड़ी हो वह बेटा आराम कैसे कर सकता है। भगत सिंह की देश भावना को देश कर सार्जेंट का दिल भी पसीज गया।  उसने अगले स्टेशन पर भगत सिंह को गाड़ी से उतारा और जिस बोगी में बटुकेश्वर दत्त थे , उसमें ले गया।  दोनों ने एक दूसरे को देखा और गले मिले। भगत सिंह ने बटुकेश्वर दत्त को कहा कि हमारी अगली रणनीति जेल में भूख हड़ताल करनी है। भगत सिंह को यह पता ही नहीं था कि जिस ट्रेन में वह सफर कर रहे हैं उसी में उनके पिता किशन सिंह भी हैं। अगले स्टेशन पर जैसे ही गाडी रुकी। पिता किशन सिंह ने भगत सिंह को कुछ खाने के लिए दिया , भगत सिंह ने स्पष्ट इंकार करते हुए कहा , अबसे हम भूख हड़ताल पर हैं। १४जून  १९२९   वाले दिन दोनों  ने जेल में तय योजना के अंतर्गत भूख हड़ताल शुरू कर दी। दोनों ने जेल के अधिकारियों को साफ़ – साफ़ कह दिया जब तक जेलों की व्यवस्था और कैदियों के साथ व्यवहार मानवीय नहीं होगा , हम भूख हड़ताल जारी रखेंगे।
(जारी …….)
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