भारत की आज़ादी का कड़वा सच (भाग – १८ )

(कर्ण हिंदुस्तानी )
इधर भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त की भूख हड़ताल शुरू थी तो उधर एक और मुकदमे की तैयारी ब्रिटिश सरकार ने शुरू कर दी। सांडर्स के वध में शामिल सभी लोग गिरफ्तार कर लिए गए थे , मात्र चंद्रशेखर आज़ाद की गिरफ्तारी बाकी थी। सभी पर मुकदमा चलाने के लिए लाहौर को चयनित किया गया। भगत सिंह को छोड़ सभी अभियुक्त लाहौर की जेल में ही थे। १७ जून १९२९ को भगत सिंह ने मियांवाली जेल से पंजाब जेल के इंस्पेक्टर जनरल को खत लिखा कि मियांवाली जेल में रहते हुए उन्हें मुकदमे की तैयारी करने में परेशानी होगी अतः उन्हें लाहौर जेल में भेज दिया जाए।
ब्रिटिश सरकार ने भगत सिंह की बात को स्वीकार कर लिया। १० जुलाई १९२९ को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त की तबियत  काफी खराब थी , दोनों भूख हड़ताल की वजह से चल पाने में भी असमर्थ थे , इसलिए दोनों को पेशी के समय स्ट्रेचर पर लाया गया। दोनों युवा क्रांतिकारियों की हालत देख कर अदालत में उपस्थित जन समुदाय हिल गया। दूसरे दिन सभी समाचार पत्रों में इस बात की खबर छपी तो युवाओं में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आग भड़क उठी। लोग ब्रिटिश हुकूमत की ईंट से ईंट बजाने को तैयार हो गए। बोस्टर्ल जेल से जो क्रांतिकारी जज के सामने पेश किये गए थे।  उन्होंने ने जब भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त की हालत देखी तो उन्होंने ने भी भरी अदालत में अपनी भूख हड़ताल की घोषणा कर दी।
भगत सिंह की शारीरिक हालत दिन ब दिन गिरती जा रही थी। भगत सिंह और उनके साथियों की भूख हड़ताल की खबरें रोज़ की अखबारों की सुर्खियां बन रही थीं। अंग्रेजी हुकूमत इस भूख हड़ताल से परेशान हो उठी। सभी क्रांतिकारी सिर्फ पानी पीकर ज़िंदा थे। जेल के अधिकारियों ने एक निर्णय लिया और पानी के मटकों में से पानी निकाल कर उनमें दूध भर दिया। ताकि कैदियों की भूक हड़ताल टूट जाए।  जब इस बात की खबर क्रांतिकारियों को लगी तो सभी ने दूध से भरे मटके तोड़ दिए। जेल में बंद क्रांतिकारी यतीन्द्रनाथ की हालत काफी बिगड़ चुकी थी।
भगत सिंह यतीन्द्रनाथ की हालत से परेशान हो उठे। भगत सिंह ने सभी साथियों को भूख हड़ताल तोड़ने का सन्देश भिजवा दिया , मगर कोई भी इसके लिए राजी नहीं हुआ। ०२ सितंबर १९२९ वाले दिन भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त की भूख हड़ताल का ८१ वां दिन था। बाहर भारतीय जनता में गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच रहा था। भगत सिंह ने यतीन्द्रनाथ की बिगड़ती हालत को देखते हुए भूख हड़ताल बंद करने का निर्णय लिया। सभी ने ०२ सितंबर को भूख हड़ताल तोड़ दी। ब्रिटिश सरकार ने सभी को आश्वासन दिया था कि यदि वह सभी भूख हड़ताल खत्म कर देंगे तो यतीन्द्रनाथ को रिहा कर दिया जाएगा। मगर ऐसा नहीं हुआ।  जिसके चलते सभी ने फिर से भूख हड़ताल शुरू कर दी। आखिरकार १३ सितंबर १९२९ को यतीन्द्रनाथ शहीद हो गए।
(जारी ……..)
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