भारत की आज़ादी का कड़वा सच (भाग – २३ )

(कर्ण हिंदुस्तानी )
लोग अब भगत सिंह की चर्चा बेख़ौफ़ क्रांतिकारी के रूप में करने लगे थे।  हर किसी की जुबां पर बस भगत सिंह , राजगुरु और सुखदेव का ही नाम था। १७ फरवरी १९३१ को गाँधी जी वायसराय से पहली बार मिलने पहुंचे , देश भर में इस मुलाक़ात का जिक्र होने लगा। ०४ मार्च १९३१ को रात भर गाँधी और इरविन में बात होती रही। डिफेंस समिति एक बार फिर भगत सिंह और उनके साथियों की फांसी रुकवाने की बात पर अड़ गई। सभी ने एक योजना को अंजाम देने की योजना बनाई , जिसके अंतर्गत देश भर में उठ रही भगत सिंह बचाओ की मांग को देख कर यदि वायसराय के समक्ष फांसी रोकने की मांग राखी जाएगी तो फांसी रोकी जा सकती है। उधर गाँधी इरविन समझौते की वजह से देश भर में जश्न का वातावरण बन रहा था। इसी वातावरण के बीच वकील प्राणनाथ तीनों क्रांतिकारियों से मिलने जेल पहुँच गए। उनसे अपील पत्र पर हस्ताक्षर करने को कहा गया। अपील की बात सुनकर राजगुरु और सुखदेव गुस्से से लाल – पीले हो उठे।  मगर भगत सिंह ने दोनों को शांत करवा दिया। प्राणनाथ ने कहा आज रात हमारी समिति दया याचिका तैयार करेगी मैं कल याचिका लेकर आऊंगा , तुम और राजगुरु – सुखदेव उस पर हस्ताक्षर कर देना। दूसरे दिन प्राणनाथ दया याचिका लेकर भगत सिंह के पास आये।  भगत सिंह ने बड़े ही मजाकिया लहजे में कहा , यार रहने दो तुम अपनी याचिका अपने पास , हम सभी ने अपनी बात  पंजाब के गवर्नर को भेज दी है। लो तुम भी वह पढ़ लो और तसल्ली कर लो। प्राणनाथ ने जब वह पत्र पढ़ा तो उनके पैरों तले ज़मीं खिसक गई , पत्र में भगत सिंह और अन्य क्रांतिकारियों ने लिखा था , हमारे विरोध में जो भी दोषारोपण किया गया है उससे यह साबित होता है कि हमने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ चल रहे भारतीय जनता के युद्ध में हिस्सा लिया है। इसी लिए हम युद्ध बंदी हैं , आपने हमें फांसी पर लटकाये जाने का निर्णय लिया है। आपको इसके लिए अधिकार भी हासिल हैं। हमने इस बारे में कोई दया याचिका भी नहीं पेश की है। हम सिर्फ यह चाहते हैं कि हमारे प्रति युद्ध बंदियों जैसा ही बर्ताव किया जाए और फांसी के बजाए हमें गोली से उड़ा दिया जाए। १९ मार्च १९३१ को यह पत्र लिखा गया और अगले दिन २० मार्च १९३१ को गाँधी इरविन समझौते की खबर को दरकिनार कर इस पत्र ने सभी अखबारों की सुर्खियां बटोरी। भारतीय जनमानस जो गाँधी की ओर मुड़ने लगा था वह फिर भगत सिंह की तरफ आ खड़ा हो गया। ब्रिटिश सरकार भगत सिंह की हर नीति से थकने लगी थी।  उसने भगत सिंह और उनके साथियों को जल्द से जल्द खत्म करने की नीति पर विचार करना शुरू कर दिया।
(जारी …….)
Please follow and like us:
error

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Please wait...

Subscribe to our Newsletter

To get Notified of our weekly Highlighted News. Enter your email address and name below to be the first to know.
error

Enjoy this blog? Please spread the word :)

Facebook
Twitter
YouTube
Follow by Email