भारत की आज़ादी का कड़वा सच (भाग -२४ )

(कर्ण हिंदुस्तानी )
ब्रिटिश सरकार भगत सिंह और उनके साथियों की बढ़ती लोकप्रियता से ख़ौफ़ज़दा हो गई थी। भगत सिंह ने जेल की काल कोठरी में नित्य होने वाले बदलाव को भांप लिया था।  उन्हें पता चल गया था कि अब किसी भी दिन यह अँगरेज़ अचानक फांसी का फंदा हमारे गले में डाल देंगे।  भगत सिंह ने जेल में अपने विश्वास पात्र वार्डन को बुलाकर अपने वकील प्राणलाल मेहता को एक पत्र भिजवाया और पत्र के अंत में लिखा कि वसीयत के बहाने से मुझे आकर मिलो और साथ में लेनिन का जीवन चरित्र भी लेते आना। उधर भगत सिंह के पिता सरदार किशन सिंह की अर्ज़ी अदालत ने ठुकरा दी। इसी समय सरकारी वकील कोरडेनोड ने भगत सिंह और उनके साथियों को फांसी पर लटकाने की इज़ाज़त का पत्र भी अदालत से हासिल कर लिया। इस मौत के फरमान की जानकारी भगत सिंह के पिता को भी लग गई।  सरदार किशन सिंह उसी दिन भगत सिंह की माँ और अन्य रिश्तेदारों को लेकर भगत सिंह से मिलने जेल पहुंचे। मगर जेल के अधिकारियों ने किसी को भी भगत सिंह से मिलने की इज़ाज़त नहीं दी।  केवल वकील प्राणनाथ को ही भगत सिंह से मिलने की इज़ाज़त दी गई।  भगत सिंह ने प्राणनाथ को देखते ही पूछा लेनिन का जीवन चरित्र लाये हो क्या ? प्राणनाथ ने लेनिन का जीवन चरित्र बघत सिंह को देते हुए कहा , भगत देश के नाम कोई अंतिम सन्देश देना चाहोगे ? भगत सिंह ने बिना कोई भूमिका बनाये कहा , साम्राजयवाद मुर्दाबाद , इंक़लाब ज़िंदाबाद।  प्राणनाथ ने भगत सिंह को शांत बैठे देख फिर पूछा आपकी अंतिम इच्छा क्या है ? भगत सिंह थोड़ा मुस्कुराकर बोले , मेरी अंतिम इच्छा यही है , दुबारा इसी धरती पर जन्म मिले और फिर मैं माँ भर्ती की सेवा कर सकूँ। भगत सिंह ने उनका मुकदमा लड़ने वाले सभी अधिवक्ताओं को धन्यवाद दिया और फरार क्रांतिकारियों को शुभकामनायें दी। तभी जेल के मुख्य वार्डन हवलदार चतर सिंह के पास सूचना आ गई कि आज शाम को भगत सिंह , राजगुरु और सुखदेव को फांसी दे दी जाएगी। चतर सिंह भगत सिंह के पास पहुँच कर बोले बीटा अंतिम समय आ गया है , अब तो गुरु का नाम ले लो और गुरुवाणी का पाठ कर लो। भगत सिंह ज़ोर से हँसे और कहने लगे मैं आपकी बात मान लेता यदि आप यह काम मुझसे कुछ दिन पहले कहते अब गुरु का नाम लूंगा तो लोग कहेंगे भगत सिंह बड़ा बुजदिल था , अंतिम समय  में भगवान को याद करने लगा था। इसी वजह से मैं कहता हूँ या मानता हूँ की जिस तरह से मैं आज तक जिया हूँ उसी तरह से इस दुनिया से चला भी जाऊंगा। कुछ लोग मुझे नास्तिक भी कहेंगे मगर यह लोग इस तरह की बात तो ना कहेंगे कि भगत सिंह को भी अंतिम समय में भगवान की याद आ गई थी और मौत को सामने देख भगत सिंह के पाँव थर्राने लगे थे। सरदार चतर सिंह के सामने भगत सिंह के रूप में एक बे खौफ क्रांतिकारी खड़ा था जो अंतिम समय में भी अपनी बात निडरता से कह रहा था। चतर सिंह ने वाहे गुरु कहा और वहाँ से चलना ही उचित समझा।
(जारी …….)
Please follow and like us:
error

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Please wait...

Subscribe to our Newsletter

To get Notified of our weekly Highlighted News. Enter your email address and name below to be the first to know.
error

Enjoy this blog? Please spread the word :)

Facebook
Twitter
YouTube
Follow by Email