भारत की आज़ादी का कड़वा सच (भाग – २६ )

(कर्ण हिंदुस्तानी )
आख़िरकार अंग्रेज़ सरकार ने वह वक़्त ला ही दिया जिसका इंतज़ार भगत सिंह , राजगुरु और सुखदेव कर रहे थे।  तीनों क्रांतिकारी देश की खातिर अपनी जीवन लीला को समाप्त करने की चौखट पर जाने को आतुर हो रहे थे। लाहौर जेल की काल कोठरी में भगत सिंह अपने मित्र और मशहूर अधिवक्ता के द्वारा दी गई लेनिन की जीवनी पढ़ने में मग्न थे। कुछ पन्ने पढ़ने के पश्चात भगत सिंह को महसूस हुआ कि काल कोठरी का दरवाज़ा खुल रहा है। भगत सिंह ने किताब की ओर से अपना ध्यान हटाया और कोठरी के दरवाज़े की ओर देखा , सामने जेल का एक अधिकारी खड़ा था। उसको देख कर भगत सिंह मुस्कुरा कर बोले , बोलिये क्या हुक्म दिया है आपकी सरकार ने ? जेल के उस अधिकारी का चेहरा भगत सिंह की मुस्कराहट के सामने फींका पड़ गया , उसने एक ही सांस में कहा , उठिये सरदार जी , तैयारी कीजिये , आपको फांसी पर चढ़ाने का हुक्म आ गया है। भगत सिंह ने अपने हाथ की किताब को अचानक आसमान की तरफ उछाल दिया और बोले तो फिर , चलिए , देर किस बात की ? भगत सिंह अपनी काल कोठरी को एक बार पूरी तरह से निहार कर देखते हैं और फिर कोठरी से बाहर आ गए। तभी दूसरी काल कोठरी से राजगुरु और सुखदेव भी बाहर आ जाते हैं। बाएं सुखदेव , बीच में भगत सिंह और दाएं राजगुरु चलने लगे। तीनों क्रांतिकारी साथ में चलने लगे। अचानक भगत सिंह गाने लगे
दिल से निकलेगी ना मरकर भी वतन की उल्फत
मेरी मिट्टी से भी खुशबू – ए – वतन आएगी
भगत सिंह को गाते देख राजगुरु और सुखदेव भी गाने लगे , वतन के लिए जान कुर्बान करने निकले इन नौजवानों को देखने जेल में बंद तमाम अन्य कैदी अपनी – अपनी बैरकों के दरवाज़े पर आ गये और जोर – जोर से वतन परस्ती के नारे लगाने लगे। पूरा लाहौर जेल हिल उठा। हर बैरैक में से इंकलाबी आवाज़ आने लगी थी। हर कोई भगत सिंह , राजगुरु और सुखदेव की आवाज़ बनना चाहता था। तीनों आज़ादी के दीवाने अपनी मस्ती में चले जा रहे थे। किसी के चेहरे पर मौत का कोई खौफ नहीं दिख रहा था।  लाहौर जेल की दीवारों का हर कोना – कोना इन क्रातिकारियों की मस्ती का गवाह बना हुआ था। जेल की दीवारों में लगी ईंटें भी इन क्रांतिकारियों की मस्ती को निहार रहीं थी। ब्रिटिश हुकुमत की हर चाल को नाकाम कर देश में इन्कलाब की मशाल जलाकर खुद को अहले वतन से रुखसत करने के लिए चली तीनों की टोली के लिए आज का दिन होली – दीवाली से
कम नज़र नहीं आ रहा था।
(जारी ….)
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