भारत की आज़ादी का कड़वा सच (भाग -३९ )

(कर्ण हिन्दुस्तानी )
भारत की आज़ादी की मांग को ब्रिटिश हुकूमत के सामने रखते हुए कांग्रेस के नुमाइंदे के रूप में गाँधी जी ने गोलमेज सम्मेलन में मुसलमानों के हितों की बात रखी ज़रूर थी मगर जिन्नाह का मानना था कि गाँधी दिखावा कर रहे हैं। जिन्नाह की नज़र में गाँधी कांग्रेस का एक ऐसा तुरुप का पत्ता हैं जिसे कभी भी आगे कर खेल के रूख को बदला जा सकता है। कांग्रेस और मुस्लिम लीग कभी भी किसी भी मुद्दे पर एक साथ नहीं आये। जिसका नतीज़ा यह हुआ कि मुस्लिम लीग के प्रतिनिधि कांग्रेस के अधिवेशनों से कन्नी काटने लगे। नेहरू और गाँधी ही आज़ादी की जंग के चेहरे के रूप में सामने दिखने लगे।  बाकी नेताओं की हर मसले पर दिखावे के लिए राय ली जाती मगर आखिरी फैसला गाँधी और नेहरू ही लेते थे।  इस फैसले को सभी को मानना पड़ता था। ब्रिटिश हुकूमत भारत में फूट डालो – राज करो की रणनीति को सफलता से लागू कर चुकी थी।  हिन्दू – मुस्लिम आपस में लड़ने लगे थे। लीग को भी इस बात का एहसास था कि ब्रिटिश हुकूमत की वजह से ही दोनों समुदायों में पड़ी लकीर अब बड़ी दरार के रूप में अपना रंग दिखाने लगी है।  इस दरार के नतीजों से भी दोनों समुदाय अच्छी तरह से परिचित थे।  मगर अब बात हाथ से निकल चुकी थी। दोनों समुदायों में मेलजोल होना असम्भव नहीं लग रहा था। मुख्य बात यह भी थी कि दोनों समुदाय के कथित बुद्धिजीवी लोग इस मसले को ज्यादा तवज़्ज़ो नहीं दे रहे थे।  उनका मानना था कि आज़ादी हासिल होते ही दोनों समुदायों के आपसी झगड़े मिट जाएंगे और दोनों भारत की तरक्की के लिए मिलकर योगदान देंगे।  मगर इन बुद्धिजीवी नेताओं को आने वाले खतरे का कोई एहसास ही नहीं था। पूर्ण आज़ादी के सपने को साकार करने की जद्दोजेहद में साम्प्रदायिकता के बढ़ते खतरे को नज़र अंदाज़ किया गया। ब्रिटिश हुकूमत हालांकि अंदर ही अंदर खुश थी कि दोनों समुदायों के बीच तनाव बढ़ता जा रहा है।  आज़ाद भारत का सपना तो पूर्ण होने की कगार पर था लेकिन विशाल और अखंडित भारत का सपना अधूरा ही रहने वाला था।  इस बात का एहसास किसी को हो ही नहीं रहा था।  दिन – रात ब्रिटिश हुकूमत के साथ दिग्गज नेताओं की चर्चा हो रही थी। हर कोई आज़ादी का सपना मन में लिए कदम दर कदम आगे बढ़ रहा था।  इस दौरान किसी का मन दुःख रहा है इस ओर किसी का भी ध्यान नहीं था। गाँधी के बढ़ते प्रभाव से जिन्नाह चिंतित थे उन्हें लगने लगा था कि आज़ादी के बाद भारत में मुसलमानों के साथ सौतेला व्यवहार किया जाएगा।  हिन्दू बहुसंख्यक होने की वजह से मुस्लिमों के अधिकारों की ओर कोई ध्यान नहीं देगा। जिन्नाह ने अब मन में इस बात को घर कर लिया था कि मुसलमानों के लिए स्वतंत्र गणराज्य होना ही चाहिए।
(जारी ……)
Please follow and like us:
error

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error

Enjoy this blog? Please spread the word :)

Facebook
Twitter
YouTube
Follow by Email