भारत की आज़ादी का कड़वा सच – (भाग -४० )

(कर्ण हिंदुस्तानी )
जिन्नाह के मन में मोहनदास करमचंद गाँधी के साथ – साथ नेहरू के प्रति भी नफरत का बीज पनपता जा रहा था।  यह बीज अब वट वृक्ष बनने की राह पर निकल पड़ा था। इस वट वृक्ष को एक  तरफ से बढ़ने से रोकने की कोशिशें होने लगीं थीं तो दूसरी तरफ  स्वतंत्र मुस्लिम गणराज्य की मांग अब हर मुस्लिम  के मन में घर करने लगी थी। जिन्नाह की मुस्लिम गणराज्य की मांग का मुख्य कारण आज़ादी के तुरंत बाद जिन्नाह को  हिन्दुस्तान का प्रधानमंत्री ना बनाना भी था। पंडित नेहरू हर हाल में खुद को आज़ाद हिन्दुस्तान का प्रधानमंत्री बनाने की जद्दोजेहद में लगे थे।  जबकि कांग्रेस के भीतर नेहरू को बतौर प्रधानमंत्री देखने वालों की संख्या नगण्य थी।  सभी चाहते थे कि सरदार वल्लभ भाई पटेल को प्रधानमंत्री बनाया जाए। जबकि कुछ लोग इस पक्ष में थे कि यदि हिन्दुस्तान को बंटवारे से बचाना है तो जिन्नाह को आज़ाद हिन्दुस्तान का  पहला प्रधानमंत्री बना दिया जाए।  सभी यह भी जानते थे कि जिन्नाह को कई तरह की बीमारियों ने घेर रखा है। जिन्नाह की तबियत भी उनका साथ नहीं दे रही थी।  शराब और धूम्रपान की वजह से जिन्नाह को लाइलाज बीमारियां हो चुकी थीं। यदि जिन्नाह प्रधानमंत्री बन भी जाते तो उनका कार्यकाल ज्यादा देर तक नहीं रहता। मगर हिन्दुस्तान का पहला प्रधानमंत्री बनने का जो सपना नेहरू देख रहे थे।  उस सपने को तोड़ने का दुस्सह गाँधी में भी नहीं था। जिन्नाह गाँधी की अनशन वाली नीति से भी अक्सर खफा रहते थे।  कई जगह जिन्नाह ने कहा कि गाँधी अनशन का ढोंग कर अपनी बात मनवाने में माहिर हो चुकें हैं। जिन्नाह का यह भी मानना था कि आज़ादी के बाद हिन्दुस्तान में मुसलामानों पर ज़ुल्म किये जाएंगे , हिन्दू बहुसंख्यक होने की वजह से मुस्लिमों को उनके हक़ से महरूम रखेंगे। जबकि ऐसा तब तक किसी के भी मन में नहीं आया था जब तक जिन्नाह ने स्वतंत्र मुस्लिम गणराज्य की अपनी मांग को खुले आम सबके सामने रखना शुरू नहीं किया था।  जिन्नाह की इस मांग को देखते हुए कुछ हिंदुत्ववादी संगठनों ने आज़ाद हिन्दुस्तान को हिन्दू राष्ट्र घोषित करने का प्रचार भी करना शुरू कर दिया था। इसके लिए कार्य भी शुरू हो गया। इस वजह से मुस्लिम जनता को और भी भय लगने लगा। इस भय को ही जिन्नाह ने भुनाना शुरू कर दिया। गाँधी , नेहरू , पटेल और अन्य सभी ने जिन्नाह की मुस्लिम राष्ट्र की मांग को गलत करार देते हुए आज़ाद हिन्दुस्तान को धर्म निरपेक्ष राष्ट्र घोषित करने की चाल चली। इस धर्म निरपेक्ष राष्ट्र में सभी धर्मों को सामान अधिकार देने की बात की गई।  जिन्नाह इस बात को भी नकारते हुए स्वतंत्र मुस्लिम गणराज्य की अपनी एक तरफ़ा मांग पर अड़ गए।
(जारी ……)
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