भारत की आज़ादी का कड़वा सच (भाग – ६)

(कर्ण हिंदुस्तानी )
मोहम्मद अली जिन्ना की अंग्रेज़ों के प्रति नफरत को अंग्रेज़ भांपने लगे थे।  अंग्रेजी हुकूमत को इस बात का एहसास हो गया था कि यदि रंगभेद की नीति अपनाई गई तो बड़े पैमाने पर बगावत हो सकती है इसलिए अंग्रेज़ों ने हिन्दू विरुद्ध मुस्लिम   कार्ड खेलने की चाल पर ध्यान देना शुरू किया। अक्टूबर १९०६ में वायसराय के शिमला वाले आवास पर रीगल बॉलरूम में तीस से ज्यादा मुस्लिम हस्तियों को आमंत्रित किया गया।  इनमें भारत के प्रांत और अन्य देशी सियासतों के नामचीन लोग शामिल थे। इन मुस्लिमों का परिचय आगा खान  ने वायसराय से करवाया। इसके बाद एक निवेदन पढ़ कर सुनाया गया जो कि अंतरिम सरकार के मंत्री डनलप स्मिथ को पहले ही भेजा जा चुका था। पत्र में लिखा गया था ‘ भारत के मुसलमानों ने हमेशा से इन्साफपरस्ती और निष्पक्षता में विश्वास किया है , यही मुस्लिमों के हुक्मरानों की खासियत रही है , यही वजह है कि मुसलामानों ने अपनी मांगें गैर ढंग से कभी नहीं उठाईं। हमारी निजी राय है कि भारत के मुसलामानों को आने वाले वक़्त में वक़्त की कसौटी पर सही उतरने वाली अपनी परम्परा ना त्यागनी पड़े। ‘ इस पत्र को पूरी तरह से सुनने के पश्चात पहली दफा भारत के मुसलमानों ने  हिन्दुओं के खिलाफ अंग्रेजी शासकों से मदद मांगते हुए राष्ट्रिय हित जैसे शब्दों का उल्लेख किया था। इसके बाद वायसराय ने घोषणा की ‘ यदि इस महाद्वीप की जनसंख्या का निर्माण करने वाले समुदायों की आस्था और परम्परा की अनदेखी कर भारत में किसी भी तरह का निर्वाचित प्रतिनिधत्व लागू किया गया तो इसे शरारती तत्वों की कोशिस माना जाएगा। मुस्लिम समुदाय इस बात से आश्वस्त रह सकता है कि एक समुदाय के रूप में उनके राजनीतिक हक़ और हित मेरे द्वारा किये गए किसी भी प्रशासनिक पुनर्गठन में सुरक्षित रखे जाएंगे। वायसराय की इस घोषणा का मुस्लिम प्रतिनिधि मंडल पर काफी गहरा प्रभाव पड़ा और अंग्रेज़ों ने एक तरह से अपनी हुकूमत के खिलाफ खड़े होने वाले तकरीबन छह करोड़ बीस लाख लोगों को (मुस्लिम समुदाय ) बगावत करने से रोक लिया था। इसके बाद ३० दिसंबर १९०६ वाले दिन ढाका के प्रमुख जमींदार नवाब सलीमुल्ला खान ने अलीगढ की मोहम्मडन एजुकेशनल कॉन्फ्रेंस को वार्षिक सभा करने के लिए ढाका बुलाया। निमंत्रण में उन्होंने इस बात का भी जिक्र किया कि इस वार्षिक सभा में वे शहर में मुस्लिम आल इंडिया कन्फेडरेसी का भी आयोजन करेंगे। ३० दिसंबर १९०६ को नवाब ने शाही बाग़ में मुस्लिम लीग की स्थापना समिति की अध्यक्षता की। मुस्लिम लीग के पहले अध्यक्ष हैदराबाद के नवाब विकुल – उल – मुल्क मुश्ताक हुसैन बने। उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा कि मुसलमान इस मुल्क की आबादी का पांचवा हिस्सा हैं , इसका मतलब यह है कि अगर कभी भारत ब्रिटिश हुकूमत से मुक्त हो गया तो इस मुल्क का एक बड़ा तबका हम पर राज करेगा और हम अल्पसंख्यक बन जाएंगे। तब हमारी ज़िंदगी क्या होगी ? इस पर मुसलमानों को विचार करना होगा। इस तरीके से अंग्रेज़ों के प्रति वफादारी दिखाने वाले मुसलमान सामंती वर्ग ने मुस्लिम लीग की स्थापना कर दी। नवाब हुसैन हैदराबाद के निज़ाम के तानाशाही शासन की खातिरदारी करते रहे। निज़ाम के शासन में किसी भी तरह के राजनीतिक आंदोलन करने पर प्रतिबंध था।
(जारी …….)
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