भारत की आज़ादी का कड़वा सच (भाग – ६८ ),हिन्दुओं  और सिखों को शरणार्थी शिबिरों में भी स्थान नहीं था। 

 (कर्ण हिंदुस्तानी )
लाशों के ढेर के बीच से अपने परिजनों को तलाशना तब और भी मुश्किल हो जाता जब बारिश की मज़बूत झड़ी लग जाती। लोग अपने साथ गुलाब का फूल रख कर लाशों के बीच से गुजरते थे। ज़मीन भी अब तो कुरुक्षेत्र की भूमि बन चुकी थी। चारों तरफ लाशों का ढेर लगा था। लाशों की दुर्गंध सभी को परेशान करने लगी थी। मगर किसी के पास कोई साधन नहीं था कि लाशों को ठिकाने लगाने का कार्य हो सके। ऐसे में कुछ दरिंदे ऐसे भी थे जो लाशों के बीच से महंगे सामान और जेवर चुराने का भी काम करने लगे थे। जब कोई जेवर निकालने में दिक्क्त होती थी तो बंटवारे के दरिंदे महिलाओं और मासूम बहु – बेटियों का अंग  काट कर जेवरात निकालने में परहेज नहीं करते थे।  जिसके चलते सड़कों पर खून की धाराएं बह निकलतीं थीं। कुछ सामाजिक संस्थाएं लाशों का अंतिम संस्कार करने आगे आना चाहतीं भी थीं , लेकिन समाज के ठेकेदार नेतागण इस कार्य में अड़ंगा अड़ाने में बाज नहीं आते थे। कहीं – कहीं पर सामूहिक रूप से लाशों की शिनाख्त कर उनका अंतिम संस्कार किया गया। रोते बिलखते परिवार अपने परिजनों को खुद से विदा होते देख रहे थे।  ऐसे में जब अटारी से दुसरी गाडी के आने की खबर मिलती तो लोगों का दिल दहल उठता। अब ना जाने कितनी लाशें भेजीं होंगी जिन्नाह के हमदर्दों ने ? यही हाल उधर भी था। पंजाब से जब कोई भी गाडी नवगठित पाकिस्तान जाती तो वहाँ भी चीख पुकार मच जाती। उन्हें पता था कि खालसा पंथियों के सिर पर बदले का भूत सवार है। यह भूत पाकिस्तान के समर्थकों की वजह से ही सवार हुआ था।  सिखों को उनकी पगड़ी की वजह से पहचान कर क़त्ल किया गया। सिख महिलाओं और बच्चियों के साथ लाहौर में बलात्कार किये गए। उनकी जायदाद को लूटा गया। कई जगह तो माओं ने अपनी बच्चियों की इज़्ज़त बचाने की खातिर बच्चियों को खुद ही ज़हर दे दिया।  ताकि घर की आबरू तार – तार होने से बच जाए। हिन्दुओं और सिखों के सामने ही उनके मवेशियों को काटा गया। मगर  आज़ाद हिन्दुस्तान का कोई भी नेता इस ज़ुल्म को रोकने पाकिस्तान नहीं गया। बल्कि हिन्दुस्तान के उन मुसलमानों की हिफाज़त की हिमायत होने लगी जो पकिस्तान के नारे लगा रहे थे। हिन्दुओं को नज़र अंदाज़ किया जाने लगा , सिखों की कोई परवाह नहीं कर रहा था। अपने ही मुल्क में हिन्दू और सिख बेगानों की तरह घूम रहे थे , कोई शरणार्थी शिबिर इन दोनों कौमों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी उठाने को तैयार नहीं था। भरी बरसात में भी आधी रात को हिन्दुओं और सिखों को शरणार्थी शिबिरों से बाहर किया गया क्योंकि कुछ मुस्लिम परिवारों को पनाह देनी होती थी।
Please follow and like us:
error

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error

Enjoy this blog? Please spread the word :)

Facebook
Twitter
YouTube
Follow by Email