भारत की आज़ादी का कड़वा सच (भाग-७)

(कर्ण हिंदुस्तानी )
ढाका में गठित की गई मुस्लिम लीग में मोहम्मद अली जिन्ना ने हिस्सा नहीं लिया और कलकत्ता में १९०६ में आयोजित कांग्रेस के अधिवेशन में जिन्ना ने जाना पसंद किया।  इस अधिवेशन में चवालीस मुसलमानों , डेढ़ हज़ार हिन्दुओं , ईसाईयों और पारसियों ने हिस्सा लिया। इस अधिवेशन की अध्यक्षता भले ही दादा भाई नवरोजी ने की थी मगर तबियत खराब होने के चलते दादा भाई अपना भाषण लिखने में असमर्थ थे , अतः उनका भाषण भी जिन्ना ने ही लिखा। जिन्ना ने दादा भाई के भाषण में लिखा कि बंग भंग यानी कि बंगाल का विभाजन इंग्लैंड की भारी चूक है , जिन्ना ने आशा जताई कि आंदोलन खड़ा करके इस चूक को सुधारा जा सकता है। बंग भंग के पश्चात हिन्दुओं और मुसलामानों के बीच दरार बढ़ गई थी।  इस द्वारा के बारे में दादा भाई ने अपील करते  हुए दोनों समुदायों को कहा कि सभी वर्गों और धर्मों के भारतीय लोगों के दरम्यान एक पूर्ण राजनीतिक संघ बनना ज़रूरी है। दादा भाई ने ज़ोर देकर कहा कि मैं भारत की जनता से विनंती करता हूँ कि संघ बनाने की बात उनके ही हाथ में है , जनता में ऊर्जा , क्षमता और बेजोड़ प्रतिभा है , इसी के चलते वह अपने पैरों पर खड़े हो सकतें हैं। एक बार आज़ादी मिल जाएगी तो सभी की खुशहाली नज़र आने लगेगी। अंग्रेजी सरकार से मुक्ति के लिए भारतियों को एक संघ – एक झंडे तले आना ही होगा , उसके बिना कुछ भी सम्भव नहीं है। इस दरम्यान जिन्ना दशकों तक हर राजनीतिक मंच पर राष्ट्रिय एकता की संकल्पना पेश करते रहे। जिन्ना को एहसास था कि कांग्रेस द्वारा पेश किया गया स्वराज का लक्ष हासिल करने के लिए एकता ज़रूरी है। जिन्ना यह भी जानते थे कि यदि उनको दादा भाई नवरोजी , फ़िरोज़ शाह मेहता या फिर गोपाल कृष्ण गोखले जैसों सा मुकाम हासिल करना है तो राष्ट्रिय एकता का पक्षधर बनना ही होगा। यह सब चल ही रहा था कि महाराष्ट्र में कांग्रेस के अंदर गरम दल के नेता बालगंगाधर तिलक और बंगाल के उग्र नेता विपिनचन्द्र पाल सक्रीय हो चुके थे। यह दल देश के मुख्य राजनीतिक संगठन यानी कि कांग्रेस पर अपना प्रभुत्व कायम करना चाहता था। लोकमान्य तिलक को मार्ले के सुधारों पर विश्वास नहीं था उन्होंने जनता को बहिष्कार करने का नारा दिया। इसका नतीज़ा यह निकला कि भारत की जनता ने ब्रिटैन की मशीन से बने कपडे और अन्य माल का बहिष्कार शुरू कर दिया। जिससे स्वदेशी माल को कीमत मिलने लगी। लोकमान्य टीला के स्वराज्य का मतलब था – ब्रिटिश नागरिकों के रूप में  भारतवासियों का शासन ना होकर पूर्णतयः स्वाधीन भारतवासियों का शासन। तिलक को हिन्दुओं का समर्थन तो पूरी तरह से मिल रहा था मगर मुसलमान और अन्य अल्पसंख्यक उनसे दूर होते जा रहे थे।  ब्रिटिश सरकार की मुस्लिम लीग की स्थापना का मकसद अब रंग दिखाने लगा था।
(ज़ारी …….)
Please follow and like us:
error

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error

Enjoy this blog? Please spread the word :)

Facebook
Twitter
YouTube
Follow by Email