भारत की आज़ादी का कड़वा सच (भाग – ८ )

(कर्ण हिंदुस्तानी )
जिन्ना खुद को मुसलमान के तौर पर कहलवाने के बजाए अपनी एक अलग पहचान बनाने में यकीन रखते थे। हिन्दू – मुस्लिम एकता के पक्षधर के रूप में जिन्ना खुद को प्रमोट करना चाहते थे। शायद यही वजह रही  होगी कि जिन्ना ने मुस्लिम लीग की प्रथम मीटिंग में जाने से बेहतर कांग्रेस के अधिवेशन में जाना पसंद किया। महात्मा गाँधी से भी इसी वजह से जिन्ना का मनमुटाव हो गया था। गाँधी ने जिन्ना द्वारा आयोजित गाँधी के जनवरी १९१५ में भारत लौटने की पार्टी में वक्तव्य देते हुए कहा कि मुझे एक ऐसे मुसलमान को सामने देखकर प्रसन्नता हुई है जो ना सिर्फ अपने क्षेत्र की सभा का अभिन्न अंग है बल्कि उस सभा का सभापति भी है। जिन्ना गाँधी की इस टिप्पणी से काफी खफा हो गए थे। जिन्ना का मानना था कि गाँधी जिन्ना को अल्पसंख्यकों का नेता के रूप में पेश कर रहे थे। जिन्ना ने कभी ऐसा कोई वक्तव्य नहीं दिया था जिससे उनकी पहचान एक ख़ास धर्म के नेता के रूप में उभर कर सामने आए। जिन्ना खुद को शुद्ध रूप से भारतीय ही मानते थे।  मगर गाँधी के लफ्जों ने जिन्ना को गाँधी के लिए नफरत पैदा करने को मज़बूर कर दिया था। जिन्ना खुद को गोखले और दादा भाई नवरोजी की तरह बनता देखना चाहते थे। लेकिन इस पार्टी में सभी ने सूना कि गाँधी ने जिन्ना को मुसलमान कह कर सम्बोधित किया। गाँधी के इस वक्तव्य ने जिन्ना और गाँधी के बीच जो दरार पैदा कर दी वह दरार एक ऐसी द्वारा बनने की कगार पर आ गई कि जिन्ना के मन में गाँधी नामक शख्स मतलब बेतुका व्यक्ति बन चुका था। यह बात दीगर है कि जिन्ना और गाँधी में  ऊपरी तौर पर हर पल शिष्टाचार बना रहा।  मगर अंदरूनी तौर पर जिन्ना के मन में गाँधी के प्रति कोई आदर भाव नहीं रहा। दोनों के बीच यह भावना घर कर चुकी थी कि अब कुछ भी सम्भव नहीं है।
(जारी …..)
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