भारत की आज़ादी का कड़वा सच (भाग – ९ )

(कर्ण हिंदुस्तानी )
जिन्ना के साथ मोहनदास करमचंद गाँधी के संबंध भले ही सार्वजनिक तौर पर मधुर थे किन्तु अंदरूनी तौर पर संबंधों में जो दरार आयी थी , वह दरार भरी जानी नामुमकिन थी। खुद गाँधी भी इस दरार को भरे जाने को उत्सुक नहीं थे। उधर मुस्लिम लीग का अधिवेशन कलकत्ता में होना था। इस अधिवेशन की अध्यक्षता मौलाना मुहम्मद अली को करनी थी।  मगर अंग्रेज़ों ने उन्हें और उनके भाई शौकत अली को नज़रबंद किया हुआ था। दोनों को ब्रिटिश हुकूमत ने १९१५ के युद्ध काल के आपात अधिकारी के माध्यम से नज़र कैद किया था। ब्रिटिश सरकार ने दोनों भाइयों की कैद का कोई समाधानकारक जवाब नहीं दिया था। दोनों भाई कॉमरेड और हमदर्द नामक समाचार निकालते थे।  इन समाचार पत्रों में दोनों ने तुर्की के ऑटोमेन खलीफा की खूब प्रशंसा की थी। इसके पश्चात जिन्ना ने १९१७ में केंद्रीय विधान परिषद में दोनों भाइयों का सवाल उपस्थित किया तो उन्हें जानकारी मिली कि सम्राट के दुश्मनों के साथ हमदर्दी रखने तथा उसे बढ़ावा देने की वजह से ही दोनों भाइयों को नज़र कैद किया गया है। अली बंधुओं के मामले में गाँधी ने खुल कर मुसलमानों का साथ देना आरम्भ कर दिया। और मुसलमानों में अपनी मुस्लिम पसंद छबि बनानी शुरू कर दी। इसके साथ ही गाँधी ने सारे भारतीयों को फ़ौज में भर्ती होने की अपील कर ब्रिटिश हुकूमत के भी विश्वसनीय होने की चाल चल दी। गाँधी को मानने वालों की नज़र में गाँधी की हमदर्दी ना तो शत प्रतिशत मुसलमानों के साथ थी और ना ही युद्ध के साथ। गाँधी बिना बाधा के अपने भाग्य का सितारा बुलंद करने में जुटे थे। १९१७ के अंतिम कुछ माह और बाद में १९१८ का पूरा वर्ष गाँधी के भाग्य के लिए उदयमान वर्ष के रूप में उभर कर सामने आया। जबकि जिन्ना का मानना था कि जिस ब्रिटिश सरकार के विरोध में हम सभी रूपरेखा तैयार कर रहे हैं उस ब्रिटिश सरकार के हित में हम भारतियों की जान जोखिम में डालें। जिन्ना की मांग थी कि भारत की जनता को युद्ध में उतारने से पूर्व भारतियों को यूरोपीय प्रजा की भाँती दर्जा दिया जाए और भारतीय फ़ौज को भी रॉयल कमीशन दिया जाए।  जिन्नाki इस मांग को वायसराय चेम्सफोर्ड ने सौदेबाज़ी की उपमा दी। इस बात पर जिन्ना ने क्रोधित होते हुए जवाब दिया कि मेरे देश सम्राट के सामान प्रजा के रूप में लगातार आत्मसम्मान के साथ अपनी सरकार से आमने – सामने यह प्रतिबंध हटाना क्या सौदेबाज़ी है ? क्या अपने देश की हित की मांग करना सौदे बाज़ी कहलाता है ?
(जारी……)
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