विकृत मानसिकता को कैसे रोका जाए ?

(कर्ण हिंदुस्तानी )

देश में इस समय जो हालात चल रहे हैं उसको मानसिक विकृति के सिवा कुछ नहीं कहा जा सकता। मासूम बच्चियों के साथ जो कुछ भी हो रहा है वह विछिप्त व्यक्ति ही कर सकता है। कोई भी कैसे किसी मासूम को अपनी हवस का शिकार बना सकता है ? समाज में ऐसी मानसिकता पहले कभी नहीं थी। ऐसा नहीं है कि इससे पहले हिन्दुस्तान में बलात्कार की घटनाएं नहीं होतीं थीं , मगर इन दिनों जो मामले सामने आ रहे हैं वह दिल दहला देने वाले हैं , इंदौर की घटना हो या कठुवा की घटना हो , दोनों घटनाओं में इंसान की बदलती मनोविकृति के वीभत्स अंजाम सामने आएं हैं। इन घटनाओं को रोक पाना किसी भी सरकार के लिए असम्भव नहीं है। जरूरी है तो आरोपी को कड़ी से कड़ी सजा देने की। सालों साल तक अदालतों में मामले चलते हैं , फिर कहीं फिर्यादी की मौत हो जाती है या गवाहों को अपने बयान भूल जातें हैं। हालांकि मौजूदा सरकार ने शनिवार को कड़े नियम बनाने का प्रस्ताव केबिनट में पेश कर मंज़ूरी भी दी है। मगर सवाल यह होता है कि लोगों की मानसिकता को कैसे बदला जाए ? क्यों समाज में इस तरह की घटनाएं बढ़ रही हैं ? दरींदगी की इस हद को देख कर तो दरिन्दे भी शर्माने लगे हैं। समाज की मानसिक स्थिति को राजनीतिक रंग देने वालों से भी अब सवाल करने का समय आ गया है। अपने आप में बेहद रौंगटे खड़े कर देने वाला शब्द है बलात्कार ! इस शब्द को भी अदालतों में बचाव पक्ष का अधिवक्ता इस तरह से भुनाता है कि पीड़ित महिला अथवा नाबालिग को लगने लगता है कि आखिर उसने शिकायत क्यों की ? हमारे देश में अदालतों का जो जाल बिछा हुआ है वह भी गलत ही है। लघु न्यायालय , सत्र न्यायालय , उच्च न्यायालय और बाद में सर्वोच्च न्यायालय। इन अदालतों में एक के बाद एक सुनवाइयां होतीं हैं और बरसों लग जाते है। मेरी निजी राय है की अदालतों के काम काज को बांटा जाए , ख़ास कर बलात्कार जैसी घटनाओं के आरोपी को एक ही अदालत में साल भर के बीच सजा सुनायी जाए। कोई ऊपरी अदालत ना हो। बलात्कार चाहे मासूम बच्ची के साथ हो या फिर किसी महिला के साथ सजा एक ही हो और वह हो फांसी , इससे कम कुछ ना हो। विकृत मानसिकता के लोगों को समाज में रखना खतरे से खाली नहीं है। समाज तो क्या ऐसे लोगों को कारागृह में अन्य कैदियों के साथ रखना भी गलत होगा। मानसिक विकृतता वाला व्यक्ति कोई भी हो उसे मौत से कम सजा नहीं होनी चाहिए।

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