सरकारी मंदिरों के घोटाले रोक न पानेवाला शासन किस अधिकार से नए मंदिर नियंत्रण में ले रहा है ? – अधिवक्ता वीरेंद्र इचलकरंजीकर,

मुंबई – श्रद्धालुआें द्वारा भक्तिभाव से अर्पण किए धन में श्री सिद्धीविनायक मंदिर न्यास के पूर्व न्यासियों द्वारा की गई हेराफेरी प्रकरण में हिन्दू विधिज्ञ परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष अधिवक्ता वीरेंद्र इचलकरंजीकर ने विधि एवं न्याय विभाग में शिकायत की थी । इस शिकायत के आधार पर विधि एवं न्याय विभाग ने इस प्रकरण की विस्तृत जांच करने के लिए, सहसचिव स्तर के अधिकारी की नियुक्ति का आदेश दिया है । इसी बीच श्री सिद्धीविनायक देवस्थान के कुछ और घोटाले उजागर हो रहे हैं । शासन द्वारा निर्धारित कर्मचारियों से अधिक कर्मचारियों की नियुक्ति कर, उनके वेतन पर, देवस्थान में श्रद्धालुआें द्वारा अर्पण किए धन से नियमित सहस्रों रुपए लूटे जा रहे हैं । कार्यकारी अधिकारी संजीव पाटील के विरोध में गंभीर शिकायतें स्वयं श्री सिद्धीविनायक मंदिर के न्यासियों ने की है, तब भी शासन ने इस पर कोई कार्रवाई नहीं की है । नियंत्रण में लिए मंदिर न संभाल पानेवाला शासन किस अधिकार से नए मंदिर नियंत्रण में ले रहा है ? ऐसा प्रश्‍न हिन्दू विधिज्ञ परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष अधिवक्ता वीरेंद्र इचलकरंजीकर ने उपस्थित किया । आज मुंबई मराठी पत्रकार संघ में हिन्दू जनजागृति समिति की ओर से आयोजित पत्रकार परिषद में वे बोल रहे थे । अधिवक्ता इचलकरंजीकर ने सूचना अधिकार से मिली जानकारी के आधार पर यह सार्वजनिक किया । इस पत्रकार परिषद में हिन्दू जनजागृति समिति के मुंबई प्रवक्ता डॉ. उदय धुरी एवं कल्याण स्थित भाजपा के शहर उपाध्यक्ष डॉ. उपेंद्र डहाके भी उपस्थित थे ।

1. शासन निर्णय 4 अगस्त 2009 के अंतर्गत श्री सिद्धीविनायक गणपति मंदिर विश्‍वस्तव्यवस्था (प्रभादेवी) अधिनियम 1980 के अनुसार श्री सिद्धीविनायक देवस्थान में शासन ने 158 कर्मचारियों की नियुक्ति की अनुमति दी है । परंतु आज की स्थिति में देवस्थान में 213 कर्मचारी कार्यरत हैं । आकृतीबंधानुसार 20 पुजारियों की अनुमति है । परंतु अभी पुजारियों की संख्या 31 है । पहरेदारों की मर्यादा 27 है, तब भी वर्तमान में 62 पहरेदार हैं । सर्वसामान्य श्रमिक 15 मान्य है, परंतु वर्तमान में चौगुने अर्थात 66 श्रमिकों की नियुक्ति की गई है । 3 पदों की अनुमति होते हुए भी अभी 8 महिला कर्मचारी कार्यरत हैं । 20 स्वच्छता कर्मचारियों की अनुमति होने पर भी 27 स्वच्छता कर्मचारी कार्यरत हैं । वायरमन के पद हेतु 3 पदों की अनुमति होते हुए भी 6 लोगों की नियुक्ति की गई है । देवस्थान ने शासन से अनुमति लिए बिना, अपने स्तर पर कुल 112 अतिरिक्त कर्मचारियों को नियुक्त किया है । कामकाज बढ जाने के कारण भरती करनी पडी, ऐसा भी नहीं है । तो प्रश्‍न यह उत्पन्न होता है कि, देवस्थान की स्थावर संपत्ति उतनी ही होते हुए भी, कर्मचारियों की संख्या दुगुने से भी अधिक क्यों बढाई गई है ? भले ही कर्मचारी आवश्यक थे, तो नियमानुसार शासकीय अनुमति से बढाने की अपेक्षा अपने स्तर पर क्यों बढाए गए ? कि ‘अपने लोगों को नियुक्त करने का प्रयत्न किया गया है ? इसकी गहन जांच करना आवश्यक है ।

2. इसके अतिरिक्त देवस्थान ने पहचानपत्र देकर 441 सेवक नियुक्त किए हैं । इतनी बडी संख्या में सेवक होते हुए भी अलग कर्मचारी देवस्थान ने क्यों नियुक्त किए हैं ? विधि एवं न्याय विभाग द्वारा किए परीक्षण में यह लिखा है कि आधे से अधिक सेवक ने मंदिर में उपस्थित रहकर सेवा उपलब्ध नहीं कराई, देवस्थान द्वारा दिए परिचयपत्र का उपयोग सेवक अपने और उनके प्रियजनों के दर्शन हेतु कर रहे हैं । इसका अर्थ ये सेवक परिचयपत्र का दुरुपयोग कर रहे थे । इसका तात्पर्य यह निकलता है कि इतनी बडी संख्या में पहले सेवक नियुक्त किए जाते हैं, फिर वे काम नहीं करते, इसलिए पुनः नए कर्मचारी नियुक्त किए जाते हैं, यह श्रद्धालुआें द्वारा दिए दान का अपव्यय है ।

3. विधि एवं न्याय विभाग द्वारा किए अन्वेषण में एक और धक्कादायक बात पता चली है, न्यास के कार्यालय में कर्मचारियों की उपस्थिति के लिए ‘बायोमेट्रिक प्रणाली’ कार्यान्वित की गई है; परंतु उसमें सभी कर्मचारियों की उपस्थिति की जानकारी पूर्णतः नहीं है, साथ ही अधिकारियों ने भी शासन की अनुमति लिए बिना छुटि्टयां ली हैं ।

इस विषय में हिंदू विधिज्ञ परिषद ने शिकायत की है । उस पर अभी कार्रवाई हुई भी नहीं थी कि एक और घोटाला सामने आया है । मंदिर शासन द्वारा नियुक्त मुख्य कार्यकारी अधिकारी श्री. संजीव पाटील के विरुद्ध प्रत्यक्ष पूर्व एवं वर्तमान न्यासियों ने शासन से शिकायत की है । ये शिकायतें अत्यंत गंभीर स्वरूप की हैं; परंतु शासन ने अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की । शासन द्वारा नियुक्त न्यासियों की बात ही शासन नहीं सुनता; तो वो भक्तों की कहां सुनेगा । इन गंभीर शिकायतों में से केवल कुछ शिकायतें ही नीचे दी हैं –

अ. नोटबंदी के समय मंदिर से नोट बदल लिए !

आ. महिला भक्तों को हाथ से खींचकर उन्हें अपशब्द कहे !

इ. दानदाताआें को मूर्तियां अपने स्तर पर खरीदकर दे दीं !

ई. वाहन भत्ता मिलते हुए भी शासकीय वाहन का उपयोग किया !

उ. दानदाताआें से बिना पूछे 10 लाख रुपए लिए और मंदिर में जमा भी नहीं कराए !

ऐसे अनेक गंभीर आरोप उनपर हैं, तब भी शासन ने कोई कार्रवाई नहीं की । विधि व न्याय विभाग मुख्यमंत्री के पास है, तब भी उन्होंने  कार्रवाई क्यों नहीं की ? ऐसा प्रश्‍न इस समय अधिवक्ता इचलकरंजीकर ने उठाया ।

डॉ. उपेन्द्र डहाके ने कहा, ‘‘ आज तक शासन ने जिस भी मंदिर का सरकारीकरण किया, उस प्रत्येक मंदिर के शासकीय कामकाज में घोटाले पाए गए । शासन का व्यवस्थापन, घोटालेबाजों का व्यवस्थापन तो नहीं बन गया, ऐसा संदेह है । आज तक हमने इस संदर्भ में अनेक शिकायतें कीं, सबूत के साथ निवेदन दिए, अनेक आंदोलन किए, तब भी शासन उस पर कुछ नहीं कर रहा ।’’

3067 मंदिरों को नियंत्रित करनेवाली ‘पश्‍चिम महाराष्ट्र देवस्थान समिति’ की सीआइडी जांच चल रही है । तुळजापूर, पंढरपुर, शिर्डी, कोल्हापुर आदि मंदिरों में घोटाले चरम सीमा पर पहुंच गए । ऐसे समय शासन शनिशिंगणापुर के श्री शनैश्‍वर देवस्थान तथा मुंबई का मुंबादेवी मंदिर नियंत्रण में लेने की तैयारी कर रहा है । शासन द्वारा नियंत्रित मंदिरों में इतने घोटाले हो रहे हैं, तब भी केवल शासन की खाली तिजोरी भरने के लिए और दल के कार्यकर्ताआें का भला करने के लिए शासन मंदिर सरकारीकरण का पाप कर रहा है क्या ? सरकारीकरण के लिए शासन इतना उतावला क्यों है ? ऐसा प्रश्‍न डॉ. उदय धुरी ने इस समय किया ।

 

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