आखिर डोम्बिवली निवासी कब तक सहन करेंगे ?

(कर्ण हिन्दुस्तानी )
फिर एक बार डोम्बिवली निवासियों को वह उमीदवार मिला है जिससे डोम्बिवली निवासियों को कोई भी उम्मीद नहीं है।  बीजेपी का गढ़ बोलकर किसी भी उमीदवार को डोम्बिवली विधानसभा क्षेत्र से खड़ा करना बीजेपी की धूर्त नीतियों का ही परिचायक है।  जिस डोम्बिवली में जगन्नाथ पाटिल और हरिश्चंद्र पाटिल जैसे आम जन के विधायकों को मौक़ा दिया गया।  उसी डोम्बिवली से रविंद्र चव्हाण जैसे दसवीं पास व्यक्ति को एक – दो बार नहीं बल्कि  तीसरी बार उमीदवार बनाया गया है।

जगन्नाथ पाटिल और स्वर्गीय हरिश्चंद्र पाटिल जैसे विधायकों को आम जनता जब चाहे मिल सकती थी।  लेकिन रविंद्र चव्हाण को मिलना नाकों चने चबाने के समान  है।
डोम्बिवली के पिछले दस सालों का इतिहास देखें तो डोम्बिवली लगातार पिछड़ता ही जा रहा है।  यहां तक कि केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने डोम्बिवली को सबसे गंदा शहर कहकर सारी पोल ही खोल दी।

फिर भी बीजेपी के महाराष्ट्र के पदाधिकारियों को शर्म नहीं आयी और तीसरी बार रविंद्र चव्हाण को विधायकी का टिकिट दे दिया।  डोम्बिवली की समस्याओं की बात करें तो दिन ब दिन समस्याएं बढ़ती ही जा रहीं हैं। पूर्व से पश्चिम जाने के लिए भी अब वाहन धारकों को बड़ी समस्या दिखने लगी है।  डोम्बिवली के वरिष्ठ नागरिकों के हाल तो कोई समझने वाला ही नहीं है।

रेलवे की लिफ्ट बंद पड़ी है , कल्याण की तरफ का रेलवे पादचारी पुल अप्रैल माह से तोड़ कर रखा हुआ है।  सड़कों की हालत के बारे में कुछ बोलना ही अपराध है। मगर रविंद्र चव्हाण ने ४७१ करोड़ की निधि का झुनझुना सड़कों के लिए बजा दिया है।  निधि सिर्फ मंजूर हुई है।  ना सड़कें बनाने की निविदा निकली है ना कार्य पूरा होने का समय तय हुआ है।  मगर रविंद्र चव्हाण ने भूमिपूजन कर दिया।

जनता को रविंद्र चव्हाण जैसे लोकप्रतिनिधि गधा समझते हैं। जबकि ऐसा नहीं है।  डोम्बिवली की जनता मेहनती है , डोम्बिवली की जनता अपने शहर का भला चाहती है।  ऐसे में बीजेपी ने रविंद्र चव्हाण को तीसरी बार टिकिट देकर जो गलती की है वह बीजेपी को झटका दे सकती है।  क्योंकि अब डोम्बिवली निवासी बदलाव के मूड में है और बदलाव यदि सही में हो गया तो यही कहा जाएगा डोम्बिवली किसी समय में बीजेपी का गढ़ हुआ करता था।

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