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आखिर क्यों चुप हैं प्रधानमंत्री पी एम सी बैंक के घोटाले पर ?

(कर्ण हिन्दुस्तानी )
पंजाब एंड महाराष्ट्र को ऑपरेटिव बैंक के घोटाले पर देश की वित्त मंत्री नीला सत्यनारायण का बयान सुन कर  लगा कि देश के सहकारी बैंकों में घोटाला करने की पूरी छूट सरकार ने दे रखी है।  रिज़र्व बैंक को आगे कर वित्त मंत्री ने जिस तरह से अपना पल्ला झाड़ा है वह निंदनीय है और इसके लिए वित्त मंत्री को सार्वजनिक रूप से खाताधारकों से माफी मांगनी चाहिए। साथ ही इस मामले में खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चुप्पी तोड़ कर खाता धारकों के लिए जुबान खोलनी चाहिए।

यदि ऐसा नहीं होता है तो देश के सहकारी बैंकों के प्रति लोगों का विश्वाश  उठ जाएगा।  बैंकों में एक के बाद एक घोटाले सामने आ रहे हैं। लगों की गिरफ्तारियां हो रही हैं मगर इन बैंकों के खाता धारकों को उनकी मूल रकम नहीं मिल रही। अपनी जमा राशि को निकालने के लिए खाताधारकों को बैंक के कर्मचारियों के सामने किसी भिखारी की तरह याचना करनी पड़  रही है।

लोगों की मेहनत का पैसा रिज़र्व बैंक के एक कागजी आदेश के बाद डूबने की कगार पर आ गया है।  जिन लोगों ने पैसा डुबाया है वह सभी पुलिस हिरासत में आराम से हैं।  उनकी सम्पत्ति जब्त करने की प्रक्रिया भले ही शुरू हो गई हो लेकिन खाताधारकों को उनकी रकम का बड़ा हिंसा कभी नहीं मिलने वाला क्योंकि बैंकिंग नियमों के हिसाब से आपके खाते में कितनी भी रकम क्यों ना हो जब बैंक डूबने की कगार पर पहुँच जाता है तो हर ग्राहक को एक लाख से ज्यादा की रकम नहीं मिलती। यह बैंकिंग इन्सुरेंस नियम है।

अब जिन लोगों का व्यापार ही पी एम बैंक के खाते से चल रहा था। वह लोग क्या करेंगे।  बैंक के संचालकों की मिलीभगत से हजारों करोड़ रुपयों का घोटाला हो गया।  इस घोटाले की रकम का भुगतान आम खाता धारक क्यों करे ? ऐसे मामलों में रिज़र्व बैंक के पदाधिकारी भी शक के दायरे में आने चाहियें।  जो विगत पांच छह साल से बैंक की अनियमितताओं को नज़रअंदाज करते आ रहे थे।

यदि समय रहते पी एम बैंक के संचालकों पर रिज़र्व बैंक अंकुश लगाता तो यह दिन ना आते।  मगर सबकी मिलीभगत से हजारों करोड़ रुपयों के कर्जे वितरित किये गए। एक आम खाताधारक को बैंक से कर्ज लेने के लिए सैंकड़ों चक्कर लगाने पड़ते हैं तब जाकर कहीं लाख डेढ़ लाख का कर्ज मिलता है।  तमाम तरह की खानापूर्ति करनी पड़ती है।

उसके बाद बैंक अपने ही खाताधारक को एहसास दिलवाता है कि बैंक ने कर्ज देकर आप पर बड़ा उपकार किया है।  जबकि कर्ज की रकम का ब्याज बैंक वसूल करता है।  अब पी एम बैंक के खाताधारकों को जो यातनाएं उठानी पड़ रहीं हैं वह सरकारी प्रताड़ना से कम नहीं है।  २०१४ में सत्तासीन होने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने जनधन योजना के तहत देश भर में लोगो के खाते खुलवाए।

मगर लोगों को यह पता भी नहीं चल सका कि उनका पैसा सुरक्षित नहीं है।  बैंकों में आने वाली रकम का सरकार जमकर उपयोग कर रही है।  जब किसी बैंक में घोटाला होगा तो सरकार अपने हाथ ऊपर कर लेगी और खाताधारकों को तड़पता छोड़ देगी। रिज़र्व बैंक से सरकार कर्ज लेती है मगर जनता के डूबने वाले पैसों के बारे में सरकार ठोस निर्णय क्यों नहीं लेती ? आखिर रिज़र्व बैंक में भी तो जनता का ही पैसा है।

किसी सरकारी उद्योग को डूबने से बचाने के लिए सरकार जब वित्तीय सहायता प्रदान कर सकती है तो पी एम बैंक जैसे मामले में सरकार जनता का हित साधने हेतु आर्थिक सहायता क्यों नहीं देती ? केंद्र सरकार को जनता ने जनता के लिए चुना था ना कि जनता की गाढ़ी कमाई को घोटालेबाजों के हाथों में देने के लिए चुना था।  अब पी एम बैंक के मामले में प्रधानमंत्री को चुप्पी तोड़नी होगी।  वरना केंद्र सरकार से जनता का भरोसा उठ जाएगा।

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