विधानसभा चुनाव २०१९, सार्वजनिक मित्रमंडलों की चांदी !

स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है का नारा लगाने वाले बाल गंगाधर तिलक ने लोगों को एक मंच पर लाने के लिए १८९२ में सार्वजनिक गणेशोत्सव मित्रमंडल की स्थापना की थी। इसका मुख्य उदेश्य त्यौहार के माध्यम से रणनीति तैयार कर अंग्रेजी हुकूमत को उखाड़ कर स्वदेशी हुकूमत को सत्ता सौंपना था। लेकिन स्वतंत्रता मिलने केबाद बाद धीरे धीरे सार्वजनिक मित्र मंडलों की संख्या में इजाफा होता चला गया वहि इनके गठन के भी अनेक निजी मकसद हो गए है।

समय के अनुसार इन मित्रमंडलों की भव्यता बढ़ती जा रही है। अब हालात यह हैं कि इन सार्वजनिक मित्रमंडलों का उपयोग अपनी राजनीती चमकाने के लिए भी विभिन्न दल करने लगे हैं। महाराष्ट्र विधान सभा के इन आम चुनावों के पहले गणेशोत्सव और बाद में नवरात्री उत्सव का पर्व आया।  इन दोनों पर्वों में विभिन्न राजनीतिक दलों ने सार्वजनिक मित्र मंडलों को जमकर धन उपलब्ध करवाया. सार्वजनिक मित्र मंडलों के मंडपों में आचार संहिता लगने के पहले अपनी तसवीरें लगवाईं।

नतीजा यह सामने आने लगा कि सभी दलों के उम्मीदवारों और संभावित उम्मीदवारों ने इन सार्वजनिक मित्रमंडलों पर खुले हाथों से धनवर्षा की।  अब इन मित्रमंडलों के सदस्यों को सोशल मीडिया में प्रचार करने की जिम्मेदारी भी सौंप दी गयी है।  अपने अपने हिसाब से सोशल मीडिया पर उम्मीदवारों का प्रचार धड़ल्ले से किया जा रहा है। सूत्रों पर यदि विश्वास किया जाए तो डोम्बिवली में बीजेपी के उमीदवार ने सार्वजनिक मित्रमंडलों को बड़ी रकम दी है , कल्याण पूर्व – पश्चिम और ग्रामीण में भी सभी दलों ने जमकर सार्वजनिक मित्रमंडलों पर रुपयों की बरसात की है।

अब इन्हीं मित्रमंडलों के भरोसे विधानसभा की नैय्या पार लगाने की आस लगाए कई राजनीतिक दल बैठे हैं। इस बारे में कई सार्वजनिक मित्र मंडलों के पदाधिकारियों ने नाम प्रकाशित ना करने की शर्त पर बताया कि हमे अपने मंडल को भव्य बनाने के लिए धन की आवश्यकता होती है जो रकम ना होने की वजह से पूरी नहीं हो पाती ऐसे में हम यदि किसी उमीदवार से कुछ धनराशि दान स्वरुप लेते हैं तो हर्ज ही क्या है ?

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