CJI दीपक मिश्रा के खिलाफ विपक्ष लाया महाभियोग, विपक्ष ने उपराष्ट्रपति को सौंपा ड्राफ्ट

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस (CJI)के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने के लिए कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्ष ने सीजेआई के खिलाफ महाभियोग का ड्राफ्ट तैयार कर लिया है. सीजेआई दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग कार्यवाही के नोटिस पर सात राजनीतिक दलों के 71 सांसदों ने दस्तख़त भी कर दिए हैं. जिसके बाद विपक्षी दल ने उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू से मुलाकात की और उन्हें महाभियोग का ड्राफ्ट सौंपा.

कांग्रेस नेता गुलाम नबी आज़ाद ने कहा कि हम लोग ये प्रस्ताव एक हफ्ते पहले ही पेश करना चाहते थे, लेकिन उपराष्ट्रपति जी के पास समय नहीं था. आज हमने राज्यसभा की 7 राजनीतिक पार्टियों के साथ मिलकर राज्यसभा चेयरमैन को महाभियोग का प्रस्ताव सौंप दिया है. उन्होंने कहा कि 71 सांसदों के हस्ताक्षरों के साथ ये प्रस्ताव सौंपा है. इनमें 7 रिटायर हो चुके हैं. हालांकि, फिर भी यह जरूरी संख्या से अधिक है. उन्होंने कहा कि ये प्रस्ताव 5 बिंदुओं के आधार पर पेश किया गया है.

इन पांच आधारों पर लाया गया महाभियोग

1. मुख्य न्यायाधीश के पद के अनुरुप आचरण ना होना, प्रसाद ऐजुकेशन ट्रस्ट में फायदा उठाने का आरोप. इसमें मुख्य न्यायाधीश का नाम आने के बाद सघन जांच की जरूरत.

2. प्रसाद ऐजुकेशन ट्रस्ट का सामना जब CJI के सामने आया तो उन्होंने CJI ने न्यायिक और प्रशासनिक प्रक्रिया को किनारे किया.

3. बैक डेटिंग का आरोप.

4. जमीन का अधिग्रहण करना, फर्जी एफिडेविट लगाना और सुप्रीम कोर्ट जज बनने के बाद 2013 में जमीन को सरेंडर करना.

5. कई संवेदनशील मामलों को चुनिंदा बेंच को देना.

कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने कहा, “संविधान के तहत अगर कोई जज दुर्व्यवहार करता है तो संसद का अधिकार है कि उसकी जांच होनी चाहिए.” सिब्बल के मुताबिक, “जब से दीपक मिश्रा चीफ जस्टिस बने हैं तभी से कुछ ऐसे फैसले लिए गए हैं जो कि सही नहीं हैं. इसके बारे में सुप्रीम कोर्ट के ही चार जजों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस भी की थी.”

कैसे लाया जा सकता है महाभियोग?
-किसी भी जज या सीजेआई के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने के लिए लोकसभा में 100 सांसदों और राज्यसभा में 50 सदस्यों के हस्ताक्षर की जरूरत पड़ती है. इसका प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन में रखा जा सकता है.
-महाभियोग अगर राज्यसभा में लाया जा रहा है, तो सभापति को इसका प्रस्ताव सौंपना होता है. लोकसभा में महाभियोग लाने की स्थिति में संबंधित प्रस्ताव लोकसभा स्पीकर को सौंपा जाता है.
-इसके बाद राज्यसभा सभापति या लोकसभा अध्यक्ष पर निर्भर करता है वो इस प्रस्ताव को स्वीकार करे या रद्द कर दें.
-अगर राज्यसभा सभापति या लोकसभा स्पीकर प्रस्ताव मंजूर कर लेते हैं, तो आरोप की जांच के लिए तीन सदस्यीय कमेटी का गठन किया जाता है.
-इस कमेटी में एक सुप्रीम कोर्ट के जज, एक हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस और एक न्यायविद् शामिल होता है.
-जांच के बाद कमिटी अपनी रिपोर्ट पेश करती है. अगर संबंधित जज को दोषी पाया जाता है, तो महाभियोग का प्रस्ताव सदन में रखा जाता है. इस प्रस्ताव को लोकसभा और राज्यसभा में दो-तिहाई बहुमत से समर्थन मिलने के बाद इसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है.
-इसके बाद अंतिम अधिकार राष्ट्रपति के पास ही है. राष्ट्रपति चाहें तो अपने अधिकार का इस्तेमाल करते हुए चीफ जस्टिस को पद से हटा सकते हैं.

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