भारत की आज़ादी का कड़वा सच – (भाग – ५८ ), व्यापारियों की समस्या पर जिन्नाह और नेहरू – गांधी मौन बने।


(कर्ण हिंदुस्तानी )

जिन्नाह को इन सभी आशंकाओं का पहले से पता था।  शायद यही वजह थी कि जिन्नाह दंगों के समाचारों से बेखबर होकर मुंबई और अन्य शहरों में बनी अपनी जायदाद को बेचने की कोशिश में लग गए थे। दंगाइयों को शांत करवाने के बजाए कांग्रेस और मुस्लिम लीग के नेतागण अपनी जायदाद को सुरक्षित कैसे रखा जाए ? इस ओर ध्यान देने में लगे थे। जिन्नाह पाकिस्तान के गवर्नर जनरल बन चुके थे। पाकिस्तान की जनता जिन्नाह को अपना सबकुछ माने को तैयार थी मगर व्यापार करने वाले व्यापारी जिन्नाह को अपना दुश्मन मान चुके थे।  इन व्यापारियों ने जिन्नाह को आगाह भी किया था कि व्यापारियों को तबाह करके यदि पाकिस्तान बनाना है तो हमें मंज़ूर नहीं। दरअसल जिन सूबों को समाविष्ट कर पाकिस्तान का गठन किया जाने वाला था।
वह सूबे फसल की उपज के हिसाब से कोई अहमियत नहीं रखते थे।  व्यापार की दृष्टी से कराची , इस्लामाबाद , सिंध , लाहौर जैसे शहर बेहतर थे। मगर बात यह थी कि इन शहरों में जिस वस्तु का  भी व्यापार होता था। उसका  आयात हिन्दुस्तान से ही होता था और बंटवारे के पश्चात पाकिस्तानी व्यापारियों को हिन्दुस्तान के रहमों करम पर ही ज़िंदा रहना होगा।  यह बात व्यापारी तो भलीभांति समझ रहे थे मगर ना तो जिन्नाह इससे इत्तेफ़ाक़ रख रहे थे और ना ही नेहरू – गाँधी जैसे कांग्रेसी नेतागण। सभी को बस आज़ादी चाहिए थी। जिन्नाह को मुस्लिम राष्ट्र चाहिए था तो नेहरू – गाँधी को धर्मनिरपेक्ष हिन्दुस्तान चाहिए था।  इन दोनों देशों की अवाम का भविष्य क्या होगा , व्यापारियों की आर्थिक स्थिति कैसी होगी किसी को कोई लेना देना नहीं था। जबकि व्यापारी चाहते थे कि दोनों  देशों के बीच बंटवारे के पहले कोई ठोस व्यापार नीति बने और उसे अमल में फौरी तरीके से लाया भी जाए। व्यापारियों को इसी बात की चिंता थी कि इस माहौल में उनकी सुनने वाला कोई नहीं था। संचार माध्यम भी लगभग ठप्प हुआ पड़ा था।  जिसकी वजह से हिन्दुस्तान में रहने वाले अपने रिश्तेदारों से सम्पर्क करना भी मुश्किल प्रतीत होने लगा था।  सभी के मन में एक टीस भरी हुई थी।  ऐसे में हिन्दुस्तान जाने की सोचने वाले हिन्दू और सिख व्यापारियों के प्रतिष्ठानों को निशाना बनाकर उनकी संपत्ति पर कब्ज़ा करने की योजना को मूर्त रूप देने की बात पर कुछ उग्र विचारधारा वाले संगठन विचार  करने लगे। कल तक जो एक साथ रहते हुए ईद और होली मनाते थे वह अब एक दूसरे को शक की निगाह से देखने लगे।
(जारी …….)
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