क्या हमारा देश राष्ट्र भाषा विहीन है ?

कर्ण हिन्दुस्तानी )
हमारे देश की तथाकथित राष्ट्रभाषा हिंदी को देश भर में तीसरी भाषा के रूप में पाठ्यक्रम में शामिल करने की केंद्र सरकार की कोशिश फिर एक बार असफल हो गई। देश के कई राज्यों ने और ख़ास कर दक्षिण भाषी राज्यों ने हिंदी को तीसरी भाषा के रूप में अनिवार्य मानने से इंकार कर दिया और केंद्र सरकार ने भी अपनी बात से दो कदम पीछे हटना ही उचित समझा। इस तरह से हिंदी को सारे देश में लागू करने का प्रस्ताव औंधे मुँह गिर गया।

हिंदी यानी कि हिन्द के ललाट की बिंदी , हिंदी हमारी पहचान , हिंदी हमारी संस्कृति को जोड़ने का काम करती है जैसे स्लोगन एक झटके में ही खत्म हो गए।  तमाम हिंदी साहित्यिक संगठन कुछ भी बोल पाने में असमर्थ हो गए हैं क्योंकि हिंदी का विरोध अपने ही देश में हो रहा है।  हम अपने देश की विरासत को खुद ही खत्म करने में लगें हैं। हम भले ही देश में अनेकता में एकता की बात करते हों लेकिन जब जब हिंदी भाषा को सर्व सामान्यों की भाषा बनाने की बात आती है हम और राज्यों में बँटी हमारी संस्कृति आड़े आ जाती है।

दक्षिण भारत में सबसे पहले विरोध शुरू होता है और बाद में यह हिंदी द्धेष पश्चिम बंगाल तक फ़ैल जाता है , आसाम , नागालैंड और केरल तक में हिंदी विरोध शुरू हो जाता है।  आखिर ऐसा क्यों होता है ? आज़ादी के बाद से अब तक इस सवाल का कोई भी जवाब नहीं मिल पाया है।  हमने फिरंगियों से तो आज़ादी पा ली मगर अंग्रेजी से आज़ादी नहीं मिल सकी यही वजह है कि हिंदी का विरोध करने वाले राज्यों में अंग्रेजी का विरोध नहीं होता है।

इन हिंदी विरोधी राज्यों की जनता और नेताओं का दोगलापन किस हद तक होता है इसका एक उदाहरण यह है कि यह हिंदी विरोधी लोग जब अपने राज्यों से बाहर निकलते हैं और अन्य राज्यों में व्यवसाय करते हैं तो उस राज्य की भाषा सीखने के बजाए हिंदी सीखते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि उनके राज्य में भले ही हिंदी को सर्व सामान्य जनता की भाषा का दर्ज़ा ना मिला हो लेकिन देश का बड़ा हिस्सा आज भी हिंदी को ही संवाद की भाषा मानता है।

हमारे पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवेगौड़ा जब प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने हिंदी सीखी।  मगर पद से उतरते ही वह हिंदी को भूल गए।  दक्षिण के तमाम अभिनेता भले ही अपने राज्यों में सुपर स्टार हों लेकिन वह हिंदी फिल्मों का मोह छोड़ नहीं सकते क्योंकि उन्हें पता है देश का सबसे बड़ा दर्शक वर्ग हिंदी को ही समझता है। हमारे पूर्व राष्ट्र पति आर वेंकटरमन जी को हिंदी नहीं आती थी।  जब भी वह राष्ट्र को सम्बोधित करते थे तो हिंदी का दुभाषिया साथ होता था।  यानी कि वह भी समझते थे कि हिंदी हमारी पहचान है।

केंद्र का हिंदी को सभी राज्यों में तीसरी भाषा के रूप में पाठ्यक्रम में शामिल करने का प्रस्ताव किसी भाषा को नज़रअंदाज़ करना नहीं था। मगर एक देश एक भाषा की तरफ बढ़ाया गया सकारात्मक कदम था।  अफ़सोस केंद्र के इस कदम को गैर  हिंदी भाषी राज्य समझ नहीं पाए। हिंदी विरोधी राज्यों के इस हिंदी विरोध ने हमारे देश को राष्ट्र भाषा विहीन बना दिया।

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