डोम्बिवली में उत्साह पूर्ण ढंग से मना महापर्व छठ.

जब उदय होता है तो अस्त भी होता है , आम जनधारणा यही मानी जाती है मगर भारत की संस्कृति कहती है जो अस्त हुआ है वह निश्चित ही पुनः उदय होगा।  इसी बात का सन्देश देने का पर्व माना जाता है छठ पर्व। अस्त होते सूर्य की आराधना करने का यह  छठ  पर्व  देश और विदेश में हर जगह धूम धाम से सम्पन्न हुआ।

मुंबई और अन्य  उपनगरों में अस्त होते सूर्यदेव को अर्ध देकर यह अनोखा पर्व मनाया गया।छठ पूजा साल में दो बार होती है एक चैत मास में और दुसरा  कार्तिक मास शुक्ल पक्ष चतुर्थी तिथि, पंचमी तिथि, षष्ठी तिथि और सप्तमी तिथि तक मनाया जाता है.

षष्ठी देवी माता को कात्यायनी माता के नाम से भी जाना जाता है नवरात्रि के दिन में हम षष्ठी माता की पूजा करते हैं।  षष्ठी माता की   पुजा घर परिवार के सदस्यों के सभी सदस्यों के सुरक्षा एवं स्वास्थ्य लाभ के लिए करते हैं षष्ठी माता की पूजा , सुरज भगवान और मां गंगा की पुजा  देश समाज कि जाने वाली बहुत बड़ी पुजा है ।

प्राकृतिक सौंदर्य और परिवार के  कल्याण के लिए कि जाने वाली महत्वपूर्ण पुजा है । छठ पूजा यानी सुर्य षष्ठी व्रत पुजा पुरा परिवार के स्वास्थ्य के मंगल कामना एवं प्राकृतिक के रक्षा हेतु की जाने वाली महत्वपूर्ण पुजा है । इस पुजा में गंगा स्थान या नदी तालाब जैसे जगह होना अनिवार्य हैं यही कारण है कि छठ पूजा के लिए सभी नदी तालाब कि साफ सफाई किया जाता है

 चार  दिन तक चलने वाला छठ पर्व रविवार की सुबह सम्पन्न हो गया।  विभिन्न जगहों पर स्त्रियों ने सूर्य देव की पूजा अर्चना कर छठ मैय्या को नमन किया।  यह पर्व चार दिनों का है। भैयादूज के तीसरे दिन से यह आरम्भ होता है। पहले दिन सेन्धा नमक, घी से बना हुआ अरवा चावल और कद्दू की सब्जी प्रसाद के रूप में ली जाती है। अगले दिन से उपवास आरम्भ होता है।

व्रति दिनभर अन्न-जल त्याग कर शाम करीब ७ बजे से खीर बनाकर, पूजा करने के उपरान्त प्रसाद ग्रहण करते हैं, जिसे खरना कहते हैं। तीसरे दिन डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य यानी दूध अर्पण करते हैं। अंतिम दिन उगते हुए सूर्य को अर्घ्य चढ़ाते हैं। पूजा में पवित्रता का विशेष ध्यान रखा जाता है; लहसून, प्याज वर्जित होता है।
चौथे दिन कार्तिक शुक्ल सप्तमी की सुबह उदियमान सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। सूर्योदय से पहले ही व्रती लोग घाट पर उगते सूर्यदेव की पूजा हेतु पहुंच जाते हैं और शाम की ही तरह उनके पुरजन-परिजन उपस्थित रहते हैं। संध्या अर्घ्य में अर्पित पकवानों को नए पकवानों से प्रतिस्थापित कर दिया जाता है परन्तु कन्द, मूल, फलादि वही रहते हैं।

सभी नियम-विधान सांध्य अर्घ्य की तरह ही होते हैं। सिर्फ व्रती लोग इस समय पूरब की ओर मुंहकर पानी में खड़े होते हैं व सूर्योपासना करते हैं। पूजा-अर्चना समाप्तोपरान्त घाट का पूजन होता है। वहाँ उपस्थित लोगों में प्रसाद वितरण करके व्रती घर आ जाते हैं और घर पर भी अपने परिवार आदि को प्रसाद वितरण करते हैं। व्रति घर वापस आकर गाँव के पीपल के पेड़ जिसको ब्रह्म बाबा कहते हैं वहाँ जाकर पूजा करते हैं।

पूजा के पश्चात् व्रति कच्चे दूध का शरबत पीकर तथा थोड़ा प्रसाद खाकर व्रत पूर्ण करते हैं जिसे पारण या परना कहते हैं। व्रती लोग खरना दिन से चौथे दिन  तक निर्जला उपवासोपरान्त आज सुबह ही नमकयुक्त भोजन करते हैं। डोम्बिवली के म्हसोबा देवस्थान पर स्थित तालाब के किनारे छठ पूजा करने बड़ी संख्या में श्रद्धालु आये और धूमधाम से छठ पर्व मनाया गया।  इस धार्मिक स्थल पर छठ पूजा का आयोजन बरसों से म्हसोबा देवस्थान के सर्वेसर्वा चंद्रकांत पाटिल और उनके सहयोगी करते आये हैं। 

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