उनकी सबसे बड़ी बेटी की जान आपकी मदद से ही बच सकती है…

मेरी 13 साल की बेटी अंकिता को ब्लड कैंसर है. इस बात को 45 दिन हो चुके हैं, जब डाइग्नोसिस के नतीजे ने हमारे जीवन में भूचाल ला दिया था, लेकिन मेरी पत्नी और मेरे पास अब भी इतनी हिम्मत या कलेजा नहीं है कि उसे इसके बारे में बता सकें. अगर उसने पूछा कि क्या उसकी मौत हो जाएगी तो मैं उसे क्या जवाब दे पाऊंगा, जबकि मुझे खुद इस कड़वी सच्चाई से अपने दिमाग को हटाने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा देनी पड़ रही है?

मेरा नाम बासवराज पंच कावेरी है, मैं चार बच्चों का पिता हूं और बेलगाम जिले के एक गांव में रहता हूं.  मैंने यदि अगले 30 दिनों में 18 लाख रुपये का भुगतान नहीं किया, तो कैंसर मेरी सबसे बड़ी बेटी अंकिता को निगल जाएगा. आप दान के रूप में जो भी मदद करेंगे, उससे मुझे अपनी बेटी के उपचार के लिए भुगतान करने में मदद मिलेगी.

कुछ दिनों पहले तक तो मैंने कभी यह कल्पना भी नहीं की थी कि मैं अपने घर से कई किलोमीटर दूर बेंगलुरु में रहूंगा, अपनी बेटी को अस्पताल के बेड पर देखते हुए और उसको बचाने का उपाय सोचते हुए.  इस अस्पताल में आने से पहले मेरी बेटी अंकिता कितने अलग तरह की इंसान थी.  वह काफी ऊर्जावान, चंचल और जीवन से भरपूर लड़की थी.  वह हमारे पड़ोस के फार्म में रहने वाले पशुओं को काफी पसंद करती थी, तो जब वह स्कूल में नहीं होती, मैं हमेशा उसे पशुओं के साथ खेलते हुए पाता. काफी लंबे समय से मैंने उसे इसी तरह देखा है. लेकिन अब डॉक्टरों, नर्सों और अस्पताल के मनहूस वातावरण ने उसे काफी शांत बना दिया है.

मुझे अब भी वह खौफनाक दिन याद है.  19 जून को अंकिता स्कूल से लौटी ही थी, कि उसने बताया कि उसके पैरों और पेट में बहुत तेज दर्द हो रहा है. मैंने उसके ललाट पर हाथ रखा तो देखा कि वह बुखार से तप रहा था. लेकिन बुखार से होने वाली इस शुरुआत ने आखिरकार मुझे एचसीजी अस्पताल के डॉक्टर अमित जी के सामने बैठा दिया, जो मुझे ‘अक्यूट लिम्फोब्लास्टिक लूकीमिया’ शब्द का मतलब समझाने की कोशिश कर रहे थे.  मैं पेशे से किसान हूं, इसलिए इस बात को समझ नहीं पा रहा था कि हम पर क्या गुजरी है, जब तक डॉक्टर ने ‘ब्लड कैंसर’ शब्द नहीं बोला.

एक्यूट लिम्फोब्लास्टिक लूकीमिया ब्लड कैंसर का एक ऐसा प्रकार है जो पहले बोन मैरो (अस्थि मज्जा) में और बाद में अन्य स्वस्थ अंगों में लाल और श्वेत रक्त कणिकाओं (आरबीसी और डब्ल्यूबीसी) और प्लेटलेट्स जैसी सामान्य कोशिकाओं के उत्पादन में बाधा डालकर शरीर को भारी नुकसान और अंततः मौत की ओर ले जाता है.  डॉक्टर ने हमें बताया कि इस तरह के कैंसर का यदि समय से उपचार नहीं किया जाए तो यह काफी तेजी से फैलने लगता है. इसलिए अंकिता की जान तभी बच सकती है, जब जल्द से जल्द उसकी केमोथेरेपी का सत्र शुरू कर दिया जाए.  इस समय तो मेरे दिल के धड़कनों की रफ्तार थोड़ी कम हुई है, मुझे हाल में ही यह खबर सुनकर थोड़ी राहत मिली कि इसका कोई रास्ता निकल सकता है. लेकिन आगे मुझे जो बताया गया उसके बाद तो मैं अपने को बुरी तरह से असहाय समझने लगा हूं. इस उपचार की लागत तो इतनी ज्यादा है कि हमने इतना जीवन भर नहीं कमाया और न ही देखा है. मेरी बेटी को बचाने के लिए जरूरी राशि चौंकाने वाली, 18 लाख रुपये है. मुझे याद है कि जब मैंने पहली बार यह सुना तो सन्न रह गया था. इसके बाद तो मेरे दिमाग में और कोई बात आई ही नहीं कि डॉक्टर आगे क्या कह रहे हैं.  मेरी बेटी को कैंसर है! मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि आगे मुझे क्या करना है.

ऐसे मुश्किल समय में आपके आसपास के लोगों का सहयोग ही आपको बना या बिगाड़ सकता है.  मैं इस मामले में खुशकिस्मत हूं कि मेरे ऐसे तमाम रिश्तेदार और शुभचिंतक हैं जिन्होंने अपनी यथाशक्ति जो कुछ भी हो सकता है, आर्थिक मदद की.  उन्होंने तो अपना विशाल हृदय दिखाते हुए मेरी मदद की, लेकिन इसके बावजूद इलाज का जो खर्च था उसके सामने यह कुछ भी नहीं था. मैं खुद महीने में महज 2000 रुपये कमा पाता था और वह भी बंद हो गया, क्योंकि मुझे यहां बेंगलुरु में अपनी बेटी के साथ रहना था.  मैंने अपने सारे जेवरात और कीमती सामान बेच दिए. मेरी पत्नी खान-पान का छोटा सा कारोबार करके हर हफ्ते करीब 300 रुपये कमा लेती है, लेकिन इससे भी भला क्या होने वाला था. अस्पताल बेंगलुरु में है, इसलिए मैं अपनी पत्नी के साथ यहां छोटा सा कमरा लेकर रहने लगा जिसका किराया ही 300 रुपया प्रति  था.  डॉक्टरों ने कहा कि हमें इस शहर में अभी कई महीने और रहने पड़ेंगे, जिसका मतलब है कि पहले से ही ज्यादा हो रहे हमारे खर्चे और बढ़ते जाने हैं.  थोड़ा-थोड़ा करके मैंने करीब 4 लाख रुपये जुटाए.  मैं इससे ज्यादा और कुछ नहीं कर सकता था, लेकिन यह हमारी जरूरत के आधे से भी कम था. हमने अपने सभी संसाधनों का इस्तेमाल कर लिया है. अब मैं क्या करूं? मैं अपनी बेटी को बचाने के लिए पैसा कहां से लाऊं? उसके बिना यदि मैं घर गया तो उसके भाई-बहनों का सामना कैसे करूंगा?

मुझसे जो भी हो सकता था, मैंने वह सब करके देख लिया है. अब मेरी अंतिम उम्मीद उन लोगों से मिला दान ही है, जिन्होंने मेरी कहानी पढ़ी है, ताकि मैं अंकिता को बचा सकूं.

हर रात जब मैं सोता हूं तो ईश्वर से यही प्रार्थना करता हूं कि कोई चमत्कार हो जाए-मैं ईश्वर से कहता हूं कि या तो मेरी बेटी का कैंसर दूर कर दें या उसके उपचार के लिए धन दे दें. अब यह दिन-ब-दिन कठिन होता जा रहा है कि मैं अंकिता के आसपास रहूं और अपने आंसुओं को रोक पाऊं. वह अपने स्कूल वापस जाना चाहती है, अपने भाई-बहनों के साथ समय बिताना चाहती है और अपने दोस्तों के साथ खेलना चाहती है, लेकिन इसकी जगह उसे दर्द भरे तमाम टेस्ट कराने पड़ रहे हैं, वह अपने इस ‘पेट के संक्रमण’ के सबसे लंबे उपचार के खत्म होने का इंतजार कर रही है.

मुझे ऐसा लगता है कि  मैं एक असफल पिता हूं. यह जानते हुए कि यदि समय से पैसा नहीं जुटा तो मैं उसे गंवा सकता हूं, मैं उसके साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताने की कोशिश कर रहा हूं. अब मुझे क्या करना चाहिए? उसका जीवन बचाने के लिए इस असंभव जैसी राशि को जुटाने की कोशिश जारी रखूं या उसके जीवन के बचे इस सीमित समय को उसके साथ बिताऊं?

आप बासवराज की मदद केट्टो पर उनके फंडरेजर को दान देकर कर सकते हैं.

सौजन्य: http://aajtak.intoday.in

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