नक्सलवाद – सकारात्मक पहल ज़रूरी

 (कर्ण हिन्दुस्तानी )
हाल ही में गढ़चिरोली में नक्सलवादियों के हमले में हमारे 15 जवानों की शहादत हो गई। इसके बाद हमेशा  की तरह देश भर के विरोधी दल के नेताओं और सरकारी तंत्र का विधवा विलाप शुरू हो गया और अब मामला शांत होते नज़र आने लगा है। नक्सलवादी हमले होने के बाद हमारे सुरक्षा रक्षक जवान अपनी शोध मुहिम तेज़ करते हैं कुछ नक्सलवादियों को मार भी दिया जाता है और कुछ नक्सलियों को गिरफ्तार भी किया जाता है।
मगर आज तक  नक्सलवादियों की मांगों की तरफ किसी ने गंभीरता से विचार नहीं किया है।  आदिवासी और पिछड़े इलाकों में नक्सलवाद क्यों अपनी जड़ें मज़बूत कर लेता है इस पर गंभीर चिंतन होना ज़रूरी है। नक्सलवादियों के पास आधुनिक हथियार कैसे और किसके सहयोग से पहुंचते हैं ? इस पर भी विचार ज़रूरी है। नक्सलवादियों का सूचनातंत्र कैसे मज़बूत बनता है ? इस पर केंद्र और नक्सलवाद से प्रभावित राज्यों को ध्यान देना ही होगा।
हाल ही में वरिष्ठ समाजसेवक अण्णा हज़ारे ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि यदि सरकार चाहे तो वह नक्सलवादियों से बातचीत का रास्ता तलाश सकतें हैं। अण्णा की यह सोच अच्छी है।  सरकार को सकारात्मक पहलु के हिसाब से सोचना चाहिए और साथ ही साथ अण्णा को भी अब यह साफ़ करना होगए कि जो गलती दिल्ली वाले आंदोलन के समय हुई और केजरीवाल सत्ता के पिपासु बन कर उभरे वह गलती इस मामले में ना हो। इस बात पर कोई शंका नहीं की जा सकती कि अण्णा यदि चाहें तो नक्सलवादी संगठन भी बातचीत करने को राज़ी हो जाएंगे।
सभी जानते हैं कि नक्सलवाद की मूल जड़ बेरोज़गारी और सामाजिक असमानता है।  बेरोज़गार युवकों को थोड़ा लालच देकर हथियार उठाने को प्रेरित करना कुछ छिपी ताक़तों का कार्य है। यह ताक़तें कुछ राज्यों में नक्सलवाद कहलातीं हैं तो कुछ राज्यों में इनका नाम अलग हो जाता है। मगर कार्यप्रणाली एक ही रहती है।  जो युवकों  को भटकाने का कार्य करती है। सवाल यह उठता है कि आखिर ऐसा क्यों होता है ? सरकार को चाहिए कि नक्सलवाद प्रभावित इलाकों में रोज़गार के अवसर बढ़ाने के साथ साथ युवकों को सरकारी महकमें के प्रति जागरूक करे , शिक्षा का महत्त्व बताए।  यदि ऐसा होगा तो निश्चित ही नक्सलवाद को जड़ समेत खत्म किया जा सकता है।
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