महापर्व छठ के दुसरे दिन, “खरना” हर्षौल्लास से मनाया गया.आइये जाने इस पवित्र पर्व को

( राजेश सिन्हा )

बिहार उत्तर प्रदेश झारखंड में कल से शुरू हुए महापर्व छठ का आज दूसरा दिन है नहाए खाए से शुरू हुए इस पर को आज खरना या लोहंडा के रूप में मनाया जाता है इस पर्व को मनाए जाने का मुख्य कारण इस धरा पर सबसे शक्तिशाली माने जाने वाले देवता भगवान सूर्य की आराधना है जिसे छठ व्रत करने वाला माताओं के साथ उसका पूरा परिवार सूर्य के भक्ति में इन 4 दिनों में खोए रहते हैंदिपावली के छठे दिन यानी कार्तिक शुक्ल की षष्ठी को छठ पर्व मनाया जाता है

इस महापर्व छठ में शुद्धता और नियम इतने पाले जाते हैं की वर्णित करना कठिन है नहाए खाए के दिन पूरे घर की धुलाई होती है मिट्टी के फर्श वाले घरो में गोबर से पुताई होती है छठ व्रत के इन 4 दिनों में घरों में लोग चप्पल पहनना बंद कर देते हैं कोई भी छठ व्रत करने वाले परिवार का सदस्य इन 4 दिनों में फल का सेवन नहीं कर सकता है मान्यता है कि फल भगवान सूर्य को चढ़ा कर ही खाना है

इन 4 दिनों में छठ व्रत करने वाला पूरा परिवार हर पल भगवान से सूर्य से प्रार्थना करते रहता है कि भगवान हमारी पूजा में किसी से कोई गलती हो जाए तो उसे माफ करना बच्चों को जहां प्रसाद बनता है वहां जाना वर्जित हो जाता है गलती से प्रसाद में बच्चों का पाव लग जाए तो माय बच्चे को भगवान सूर्य का ध्यान कर जमीन पर सर पटक कर माफी मंगवाती है

नहाए खाए

इस दिन से महापर्व छठ की शुरुआत हो जाती है, इस दिन छठ व्रती परिवार बिना नहाए खाना नहीं खाते हैं और इस के दिन बना हुआ चावल, विना छौक के बने चने और लौकी की सब्जी का जो स्वाद खाने में मिलता है वैसा स्वाद साल भर इसी तर्ज पर बने खाना में नहीं मिलता है

खरना या लोहंडा

इस शब्द में ही छठ पूजा के लिए बने नियम का अर्थ छुपा हुआ है छठ पूजा के दूसरे दिन होने वाले पूजा खरना में छठ करने वाली महिला या पुरुष के लिए मुंह में पानी तो छोड़ दो, खर (लकड़ी का तिनका) भी मुंह में डालना वर्जित है खर-ना में घरों में दोपहर से दूध और चावल का खीर बनना शुरू हो जाता है और सूर्यास्त के दौरान पूरे नियम से भगवान सूर्य की आराधना होती है इसके बाद छठ व्रती माता भगवान् सूर्य को प्रसाद का भोग लगा कर खुद मुह झूठा करती हैं फिर प्रसाद परिवार वालो एवं अन्य लोगो में बांटे जाते हैं गांव में आज भी प्रथा है कि लोग घर घर जाकर खरना का प्रसाद खाते हैं अनेक जगहों पर इस दिन को लोहंडा के नाम से भी बुलाते है.इस दिन ज्यादातर घरो में लोहे या स्टील के बर्तन में खीर नही बनता है इस पर्व के प्रसाद के लिए पीतल के बर्तन का उपयोग होता है.

सांध्य एवं सुबह का अर्ध्य

छठ पूजा के तीसरे दिन शाम को भगवान् सूर्य को सांध्य अर्घ्य देकर पूजा की जाती है. इस दिन घरो में बच्चो से लेकर बुढो तक शाम होने का इन्तजार होता है.छठ करने वाली माताओं को खरना की रात से चोथे दिन सुबह सूर्योदय के अर्ध्य तक निराजल ही उपवास रखना पड़ता है,

प्रसाद

इस त्योहार में बाजार के मिठाइयो या फिर बाजारू पकवानों का कोई महत्व नही है इस त्यौहार में पूरी तरह से घर में बने हुए ठेकुया पकवान पिरकिया, (गोजी),चावल का लड्डू भगवान् सूर्य को चढ़ाया जाता है.और ये प्रसाद भी छठ ब्रत करने वाली माता और उनके परिवार वाले मिलकर सांध्य अर्ध्य के सुबह से बनाना शुरू करते है

यहाँ ये भी उल्लेख करना आवश्यक है की प्रसाद में ठेकुआ पकवान के लिए उपयोग होने वाला गेहू चावल साफ़ कर स्वच्छ पानी से धुलाई नहाए खाए के दिन किया जाता है और फिर इसे घरो की छतो पर नियम पूर्वक सुखाया जाता है घर की छतो पर इस पर्व के लिए जुटे बच्चो को इसकी सख्त हिदायत दी जाती है की कोई पक्षी इन आनाजो को आकर झूठा न कर दे.गावो में आज भी अनेक छठ पूजा में लगने वाले आटा को घरो की पुराने जमाने की चक्की (जांता) में पिसा जाता है,

छठ पूजा में छिलके सहित नारियल,केला,और ईख,पानी के फल सिंघारा,घाघर लिम्बू, का विशेष महत्व है महानगरो में इस पूजा का स्वरूप भले ही बदला है.लेकिन गावो में आज भी छठ पूजा का महत्व दिन व् दिन बढ़ते जा रहा है.

Please follow and like us:
error

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Please wait...

Subscribe to our Newsletter

To get Notified of our weekly Highlighted News. Enter your email address and name below to be the first to know.
error

Enjoy this blog? Please spread the word :)

Facebook
Twitter
YouTube
Follow by Email