पीएमसी के साथ अन्य बैंक बंद होने की अफवाह, कही मंदी से उबरने केंद्र की चाल तो नही ?

( राजेश सिन्हा )

पंजाब एंड महाराष्ट्र बैंक के हजारों ग्राहक इस बैंक में जमा अपने ही पैसे पाने के लिए दर-दर भटक रहे हैं कल ही रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने महाराष्ट्र के शिवाजीराव भोसले कोआपरेटिव बैंक के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर पर 300 करोड़ का घोटाला करने का आरोप लगाते हुए पूरा संचालक मंडल बर्खास्त कर दिया है जिससे इसके ग्राहकों को भी दर-दर भटकने की नौबत आ गई है

इसके साथ सोशल मीडिया पर अनेक राष्ट्रीय बैंक सहकारी बैंक और स्थानीय स्तर के पतपेढ़ीयो के बंद होने की लगातार अफवाहें उड़ रही है. अब सवाल यह उठता है कि क्या सच में किसी और बैंकों पर, कोऑपरेटिव बैंकों पर आरबीआई कार्रवाई करने के मूड में है ? या फिर ये सिर्फ भीषण मंदी से गुजर रहे देश को उबारने की कवायद है क्योकि इस पुरे मामले पर केंद्र और आरबीआई की चुप्पी लोगो में अनेक तरह के सवाल पैदा कर रहे है.

ज्ञात हो की महज 10 दिन पहले ही पीएमसी बैंक को ग्राहकों को बिना कोई पूर्व सूचना दिए इसके ट्रांजैक्शन पर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने पूरी तरह से रोक लगा दिया है जिससे इस बैंक के हजारों खाता धारक अपने ही पैसे वापस पाने के लिए दर-दर भटक रहे हैं ग्राहकों के पैसे वापसी के लिए ना तो रिजर्व बैंक कोई आश्वासन दे रहा है की ना ही केंद्र सरकार.

पिछले दिनों अपने मुंबई यात्रा पर आई देश की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी इस बैंक के खाता धारको कोई सकारात्मक आश्वासन नही दिया.इस बैंक के बेचारे खाता धारक कभी मुंबई में आंदोलन करते दिख रहे हैं तो कभी ठाणे में मुक मोर्चा निकालते हुए दिख रहे हैं वही लगातार सोशल मीडिया पर देश के अनेक राष्ट्रीयकृत बैंक और को ऑपरेटिव बैंक के बंद होने की अफवाहे घूम रही है

इस बाबत आरबीआई के साथ वित्त मंत्रालय भी चुप्पी साधे बैठा है. जबकि पीएमसी बैंक के खातेदारों की हालत देखकर अन्य बैंकों के खाताधारकों में भी असमंजस की स्थिति लगातार पैदा हो रही है अनेक बैंकों के सूत्रों के अनुसार पीएमसी बैंक पर कार्रवाई से अन्य बैंकों के खातेदारो में भी असमंजस की स्थिति है और इसी के लिए पिछले आठ-दस दिन में अन्य बैंकों से भी पैसे निकासी का प्रतिशत लगातार बढ़ता जा रहा है

अर्थशास्त्र कहता है कि किसी भी देश की अर्थव्यवस्था में जब तक जोर शोर से लेन-देन नहीं होगा तो उस देश की अर्थव्यवस्था में स्वभाविक मंदी आएगी. किसी भी बाजार में जब लोगो के पास खर्च करने के लिए पैसे ही नही होंगे तो फिर अर्थ व्यवस्था की हालत बद से बदतर होना लाजमी है. देश भर में बेरोजगारी के आकड़ो ने अपने ४५ वर्ष का पुराना रिकॉर्ड तोड़ दिया है. लोगो के पास पैसे ही नही तो बाजार में आयेगा कैसे ? ऐसे में बाजार में पैसे लाने के लिए बेहद सरल है की विभिन्न बैंक के खाताधारको में असमंजस की स्थिति पैदा की जाए. और ये लोग बैंक से पैसे निकाल कर बाजार में लगाये.

विश्व बैंक के 2 दिन पूर्व ही अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के साथ संपन्न बैठक में भारत का विकास दर वर्ष 2018-19 की ६.९ प्रतिशत की तुलना में मात्र ६ प्रतिशत रह गया है पिछले हफ्ते अर्थशास्त्र में ही नोबेल पुरस्कार विजेता और भारतीय मूल के अभिजीत बनर्जी ने यह सार्वजनिक रूप से कहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था लगातार कमजोर होती जा रही है और आरबीआई के साथ केंद्र की भी भबिष्य के लिए ऐसी कोई नीति नहीं नजर आ रही है जिसमें भारतीय अर्थव्यवस्था के सुधार होने के आसार दिखे.

नोबेल पुरस्कार विजेता अभिजीत बनर्जी ने पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के लिए विभिन्न आर्थिक योजनाएं बनाई थी इसीलिए उनके मत को संदेह से देखा जा सकता है लेकिन देश के वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के पति डॉक्टर पराकला प्रभाकर ने भी देश की अर्थव्यवस्था पर गहरी चिंता जाहिर करते हुए एक लेख लिखा है जिसमें उन्होंने लिखा है कि भले ही केंद्र की सरकार अर्थव्यवस्था की खराब हालत से इनकार करें लेकिन आंकड़ों से स्पष्ट है कि कई सेक्टर भारी संकट के दौर से गुजर रहे हैं. उनके अनुसार देश में बेरोजगारी 45 साल के ऊपरी स्तर तक पहुंच गई है इस वित्त वर्ष की पहली तिमाही में जीडीपी ग्रोथ 6 साल के निचले स्तर पर 5% पर पहुंच गया है

एक तरफ ये अर्थशास्त्र पंडित देश की अर्थव्यवस्था को खराब होने की सच्चाई बयान कर रहे हैं वहीं दूसरी तरफ सोशल मीडिया पर विभिन्न बैंको के बंद होने की अफवाहों से विभिन्न बैंकों के खाते धारकों में असमंजस की स्थिति है. और इन अफवाहों से यह साफ संदेश मिल रहा है, कि देश में जबरदस्त आर्थिक मंदी से उबरने के लिए शायद यह हथकंडे अपनाए जा रहे हैं. जिसमे लोग अपने बैंको में जमा पैसे निकाल कर मार्केट में खर्च करे.

 

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