सुशांत सिंह राजपूत आत्महत्या मामला – बॉलीवुड में रैगिंग का बोलबाला ! (भाग -दो )

(कर्ण हिंदुस्तानी )
किसी समय में अनूप जलोटा जी के भजनों से देश के नागरिकों की सुबह होती थी और अनूप जलोटा जी को लोगों ने भजन सम्राट की उपाधि तक दी हुई थी। जबकि उनके पिता जी पुरुषोत्तमदास जलोटा जी को यह उपाधि नेहरू जी के समय से ही मिल चुकी थी।

इस बीच टी सीरीज़ के मालिक गुलशन कुमार ने धार्मिक फिल्मों और भजनों की झड़ी लगा दी। हर तरफ गुलशन कुमार का नाम चमकने लगा और एक दिन खबर आयी कि संगीतकार नदीम श्रवण में से नदीम ने गुलशन कुमार की ह्त्या करवा दी।  नदीम आज भी देश के बाहर शरण लिए हुए है . इस हत्यारे  नदीम को  गुलशन कुमार ने ही हिट बनाया था।

सत्तर के दशक की बात करें तो सलीम जावेद की जोड़ी ने फिल्में और संवाद लिखने शुरू किये।  जंजीर , दीवार और शोले जैसी अनगिनत सुपर हिट फिल्में लिखी गयीं। इन फिल्मों में एक बात कॉमन हुआ करती थी और वह बात यह थी कि मुस्लिम किरदार को रहम दिल दिखाया जाता था जबकि हिन्दू किरदारों को बलात्कारी और पैसों का लालची दिखाया जाता था।

फिल्म जंजीर में अमिताभ बच्चन के सामने शेर खान के रूप में प्राण के किरदार को बड़ा किया गया , फिल्म शोले में ए के हंगल को रहीम चाचा के रूप में खड़ा किया गया जो अपने बेटे अब्दुल की डाकुओं द्वारा की गयी ह्त्या पर भी विचलित नहीं होता और कहता है काश मेरे और भी बेटा होता तो उसे भी गाँव पर कुर्बान कर देता। …

.. सलीम जावेद की फिमों में मंदिर के पुजारी को मंदिर या फिर आश्रम में ही बलात्कार करते दिखाया गया है। मुस्लिम किरदारों को जनता के सामने रहमदिल दिखाया जाने लगा।

यहीं से हिंदी फिल्मों में हिन्दू मुस्लिम का वर्चस्व बड़ा होने लगा।  जबकि सभी जानते हैं कि नौशाद जी के संगीत और मोहम्मद रफ़ी साहेब जी आवाज़ ने किसी भी धर्म को कभी अपनी कला के सामने विशेष महत्व नहीं दिया था।  रफ़ी जैसे सुरों के बादशाह ने कई भजन भी गाये थे।

समय बीतता गया और जिस हिंदी फिल्म जगत पर कभी पंजाबियों का राज चलता था वहाँ अब खान परिवार छा जाने को बेताब हो गया। सलमान खान , सैफ अली खान और आमिर खान ने हिंदी फिल्म जगत को अपने कब्ज़े में कर लिया।

अभिनय के नाम पर शून्य खान उपनाम वाले कलाकारों ने अपने प्रोडक्शन हाउस खोल लिए। यहां तक कि फिल्मों के प्रचारकों को भी अपने कब्ज़े में कर लिया। जिस्म के सौदे होना और उसी हिसाब से फिल्मों में काम देना हिंदी फिल्म जगत का भले ही पुराना फंडा हो मगर हर नायिका पर नज़र रखना खान उपनाम वाले कलाकरों ने शुरू किया।

शराब पीकर ऐश्वर्या राय जैसी अदाकारा के घर के बाहर हंगामा करने वाले सलमान खान को कौन भूल सकता है ? कौन भूल सकता है उस सैफ अली खान को जिसने एक बार करीना कपूर को स्विमिंग पूल में नहाते हुए देख कर उससे शादी करने की ख्वाब देखते हुए अमृता सिंह को तलाक दिया और अपना ख्वाब भी पूरा किया। जबकि करीना कपूर और सैफ अली खान की उम्र में काफी अंतर् है।

हिन्दू लड़कियों से शादी कर उनको तलाक देने का गोरख धंधा इन खान उपनाम वालों ने चला रखा है। इनके साथ करन जोहर जैसे पैदाइशी हिजड़े भी शामिल हैं।  समलैंगिक संबंधों के लिए प्रसिद्द करन जोहर ने भी अपनी हवस की खातिर उभरते कलाकारों को इस्तेमाल किया और फिर छोड़ दिया। हिंदी फिल्म जगत में आज की तारीख में आधे  से भी अधिक  लोग नशे के आदि बन चुके हैं।

मानसिक प्रताड़ना के शिकार होकर एक युवा खलनायक महेश आनंद हिंदी फिल्मों के साथ – साथ दुनिया  को भी  अलविदा कह देता है। मगर किसी को कोई फरक नहीं पड़ता।  बेहद उम्दा कलाकार आशुतोष राणा और हास्य कलाकार राजपाल यादव को फिल्में मिलना मुश्किल हो जातीं हैं मगर नवाज़ुद्दीन सिद्द्की हर दुसरी तीसरी फिल्म में दिख जाते हैं। क्योंकि नवाज़ुद्दीन मुस्लिम हैं।

यह सास्वत सच है। आज हिंदी फिल्म जगत में इस्लाम को बढ़ावा देने वालों को ही काम मिलता है।  वरना आप में कितना भी दम खम हो आपको इक्का दुक्का फिमों के बाद बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा।  फिर आप किसी दिन सुशांत सिंह की तरह आत्म हत्या कर लेंगे या फिर महेश आनंद की तरह गुमनाम बनकर मर जाएंगे। (जारी )

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