भारत की आज़ादी का कड़वा सच – (भाग – ६३ ) नेहरू की ज़िद्द ने क्रांतिकारियों को किया निराश।

(कर्ण हिंदुस्तानी )
जिन्नाह की बातों का कुछ भी असर होने को तैयार नहीं था क्योंकि सभी के मन में एक ही बात थी कि किसी तरह से नेहरू की मनमानी से छुटकारा मिल जाए और विश्व के मानचित्र पर एक नया मुस्लिम राष्ट्र उदय हो जाए। उधर नेहरू एन्ड कंपनी भी ख़ुशी से फूली नहीं समा रही थी। नेहरू के करीबी नेताओं का अपना एक अलग अजेंडा था। यह सब मिलकर आज़ादी के बाद के भारत की तस्वीर बना रहे थे।  जिसमें नेहरू और गाँधी के सिवा कोई भी आज़ादी की जंग का सच्चा सिपाही बनकर ना उभर सके। नेहरू के इस स्वभाव से ज्यादातर कांग्रेसी नाराज़ थे।  मगर वह कुछ भी ना कर पाने की स्थिति में थे। नेहरू की दबंगई के सामने सभी ने हथियार डाल दिए थे। आज़ादी के पश्चात की राजनीती का नया खाका खींचा जाने लगा था। १८५७ के मंगल पण्डे के गदर को इतिहास के पन्नों से नदारद करने का प्लान मूर्त रूप लेने लगा था। तमाम क्रांतिकारियों के योगदान को भुलाने का अथवा कम करने का गंदा खेल खेला जाने लगा था। नेहरू को अब चाचा नेहरू के रूप में पेश किया जाने लगा था। इसके तहत नेहरू को बच्चों का प्रिय नेता बनाने की जुगत में नेहरू की टीम जुट गई और पंडित जवाहरलाल नेहरू अचानक चचा नेहरू के रूप में अवतरित हो गए। आज़ादी की जंग में जिन लोगों ने कांग्रेस के झंडे तले आकर एकजुटता दिखाई और तिरंगा को अपना राष्ट्रीय ध्वज माना। उन लोगों को इस बात का अंदाज़ा भी नहीं था कि नेहरू की कुटिल चालों के सामने आज़ादी के बाद सभी नेहरू विरोधी देश विरोधी हो जाएंगे। कुछ को तो अंग्रेज़ों का खबरी तक कहा जाएगा। नेहरू की इन कुटिल चालों को कई लोगों ने अपने ढंग से विरोध कर रोकना चाहा मगर कोई भी सफल नहीं हो सका। नेहरू के सामने गाँधी भी असहाय नज़र आने लगे थे। सरदार पटेल , लाल बहादुर शास्त्री , डॉ राजेंद्र प्रसाद , मौलाना अबुल कलाम आज़ाद , विनोबा भावे और अन्य सभी चाहकर भी नेहरू के सामने नेहरू की नीतियों का विरोध नहीं कर पा रहे थे। क्रांतिकारियों की हालत तो यह थी कि उनको अब अपने क्रांतिकारी कार्यों के प्रति नफरत होने लगी थी।  उन्हें यह लगने लगा था कि १८५७ से १९४७ तक की आज़ादी की जंग का नतीज़ा नेहरू के सामने नतमस्तक होकर यदि जी हज़ूरी ही है तो ऐसी आज़ादी किस काम की ? कल तक जो लोग ब्रिटिश हुकूमत को कोस रहे थे वह अब नेहरू को कोसने लगे थे। नेहरू के सिर पर मिलने वाली सत्ता का भूत सवार हो चुका था।  इस सत्ता के भूत ने नेहरू की बुद्धि भ्रष्ट कर दी थी।
(जारी ……)
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