भारत की आज़ादी का कड़वा सच-(भाग – ६६ )राहत शिबिरों की दयनीय हालत और गाँधी का मुस्लिम प्रेम।

(कर्ण हिंदुस्तानी )
हर तरफ आगजनी की घटनाएं आम थीं। लोग नवगठित पाकिस्तान से बैलगाड़ियों अथवा अन्य साधनों से दरबदर घूम रहे थे। चारों तरफ अफरातफरी मची हुई थी। किसी को भी किसी की सुध लेने की चाह नहीं थी। जिनके परिजन मिल गए थे , वह खुद को खुशनसीब समझ रहे थे और जिनके परिजन भीड़ का शिकार होकर इधर – उधर हो गए थे वह बदहवास होकर उनकी तलाश में घूम रहे थे। भूख की वजह से बच्चे रोने लगे थे। मगर खाना मिले भी तो कैसे और कहाँ से। कल तक जो लोग अपने दम पर भंडारा लगाते थे वह अब भंडारा ढूंढ रहे थे। इस त्रासदी के बीच सरकार नाम की कोई भी चीज़ नज़र नहीं आ रही थी। ना तो पाकिस्तान के जनक मोहम्मद अली जिन्नाह कहीं दिख रहे थे और ना ही ज़िद्दी जवाहरलाल नेहरू किसी राहत शिबिर में नज़र आ रहे थे। लोगों के सामने सबसे बड़ी दिक्क्त यह थी कि  आखिर किसको जाकर अपना दुखड़ा सुनाया जाए। कौन है जो इस मुसीबत की घड़ी में कुछ राहत दे सके। आज़ादी के पहले बड़ी – बड़ी बातें करने वाले अब कहीं नज़र नहीं आ रहे थे। राहत शिबिरों पर भी धर्म की राजनीती का साया पड़ने लगा था। मुस्लिमों के लिए अलग राहत शिबिर बनाने की मांग ज़ोर पकड़ने लगी थी। महात्मा गाँधी ने इस अफरातफरी के माहौल में मुस्लिमों का पक्ष लेना शुरू कर दिया और मुस्लिम परिवारों को मंदिरों में शरण देने की वकालत करनी शुरू कर दी। जबकि हिन्दुओं को मस्जिदों में पनाह लेने की मनाई थी। गाँधी के इस फैसले से हिन्दू – मुस्लिमों में आपसी वैर और भी बढ़ गया। राहत शिबिरों में बरसात का पानी भरने से महामारी फैलने की आशंका बढ़ गई। लेकिन कोई भी चिकित्सक राहत शिबिर में जाने को तैयार नहीं था। एक तरह से दोनों मुल्कों के रहनुमाओं ने जनता को उसके ही हालात पर छोड़ दिया था। नेहरू और गांधी खुले आम मुस्लिम परिवारों को ख़ास मदद देते दिख रहे थे। ऐसे में जब एक राहत शिबिर में गाँधी और नेहरू गए तो शिबिर में रहने वालों ने नेहरू को मारने की धमकी दी। इस धमकी को जवाब देते हुए गाँधी ने कहा नेहरू को मारने के बजाए मुझे मार दो। राहत शिबिर के हालात को देखते हुए भोजन की व्यवस्था करनी बेहद ज़रूरी थी। मगर इतनी बड़ी तादाद में भोजन मुहैय्या कहाँ से और कौन करेगा ? यह सवाल महत्वपूर्ण था। नेतागण आते थे और आश्वासन देकर चले जाते थे। विस्थापितों के परिवार का मुखिया रात जाग कर गुजारता था और ज़रा सी आहट होने पर आत्मरक्षा के लिए रखी गई तलवार निकाल कर खड़ा हो जाता था।
(जारी ……)
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