फिर जागृत हो उठा शिवसेना का पुत्र मोह।


(कर्ण हिन्दुस्तानी )
विधानसभा चुनावों के बाद एक बार फिर शिवसेना और बीजेपी में सत्ता को लेकर उठा पटक शुरू हो गयी है।  शिवसेना ५० – ५० की बात कर रही है और बीजेपी ऐसे किसी भी समझौते से नकार दे रही है।  दोनों दल एक दूसरे को सत्ता में कम आंकने की जुगत में लगे हुए हैं। शिवसेना को जहां युवा सेना प्रमुख आदित्य ठाकरे को मुख्यमंत्री बनाना है वहीँ बीजेपी को देवेंद्र फडणवीस दुबारा पांच साल तक मुख्यमंत्री के रूप में पसंद हैं। अब सवाल यह उठता है कि बीते पांच साल तक शिवसेना ने सत्ता में रहते हुए ऐसा कौन सा कार्य किया था कि अब वह सीधे तौर पर मुख्यमंत्री पद पर हक़ जमाने को आतुर है।
अस्सी फीसदी समाज  कार्य  और  20 फीसदी राजनीती  के सूत्र को लेकर घूमने वाली शिवसेना को अब राज्य की राजनीती में शीर्ष पद चाहिए।  शिवसेना के सांसद और सामना के कार्यकारी सम्पादक संजय राउत तो इन दिनों आसमान में ऐसे उड़ रहे हैं जैसे शिवसेना उनकी जागीर है।  विगत पांच सालों में सामना में जो भी सम्पादकीय लिखे गए उनमें से सत्तर फीसदी सम्पादकीय बीजेपी की खिलाफत करने वाले ही थे।  बात यहीं खत्म हो जाती तो ठीक थी।  मगर मतगणना के तुरंत बाद संजय राउत ने अपने ट्विटर पर जो कार्टून प्रेषित किया था क्या वह उचित था ? किसी भी राजनीतिक विश्लेषक को राउत का वह ट्विटर पसंद नहीं आया होगा।  मगर संजय राउत को यह दिखाना था कि भले ही हम विधायकों के मामले में बीजेपी से कम हैं मगर हमसे ही बीजेपी को सत्ता मिलनी है। शिवसेना पक्ष प्रमुख उद्धव ठाकरे से ज्यादा आदित्य ठाकरे को मुख्यमंत्री पद पर विराजमान करने की लालसा संजय राउत दिखा रहे हैं।  जो कि यह इंगित करता है कि संजय राउत चापपलूसी की हर वह हद पार करना चाहते हैं जो कभी कांग्रेसी राहुल गाँधी को प्रधानमंत्री बनाने की कोशिशों के तहत करते थे। उद्धव ठाकरे को अपने पुत्र के प्रति मोह होना लाजिमी है मगर संजय राउत को इतनी जल्दी क्यों है ? क्या संजय  राउत अपने  मालिक की नजरों में वफादार बनने की कोशिश कर रहे हैं।  संजय राउत यह भूल रहे हैं कि इसी पुत्र मोह की वजह से शिवसेना टूट कर महाराष्ट्र नव निर्माण सेना का गठन हुआ था। राजनीती में पुत्र मोह यादाकादाचित ऊंचाइयों पर पहुंचा देता है लेकिन कभी कभी यही मोह राजनीती के धरातल के दर्शन भी करवा देता है।  राहुल गाँधी का सबसे बड़ा उदाहरण सबके सामने है।  राहुल की ताजपोशी की वजह से ही आज कांग्रेस का नाम लेने वालों की संख्या नगण्य हो गई है।  पांच साल सत्ता में रहकर इस्तीफा नाटक खेलने वाली शिवसेना के पक्ष प्रमुख यदि अभी भी अपनी धृतराष्ट्र वाली आँखें नहीं खोलेंगे और पुत्र मोह में पड़े रहेंगे तो भविष्य अंधकारमय ही होगा। 

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