गांधी को अच्छे से पढ़ने वालों को चाहिए, एक बार गोडसे को भी पढ़ें

(कर्ण हिंदुस्तानी )
भारत की आज़ादी के बाद से या यूँ कहें कि मोहनदास करमचंद गाँधी की ह्त्या के बाद से अब तक नाथूराम गोडसे को लेकर विवाद होता आया है। हाल ही मैं कमल हसन ने गोडसे को पहला हिन्दू आतंकवादी कह कर सम्बोधित किया , इसके पहले भी कई लोगों ने गोडसे को तमाम तरह से कोसा और उसे एक महात्मा का हत्यारा बताया। जबकि गोडसे के अनुसार गाँधी हत्या नहीं थी बल्कि गाँधी वध किया गया था।

अपनी आत्म कथा में भी गोडसे ने अपनी पुस्तक का शीर्षक गाँधी वध क्यों ? रखा है। इस पुस्तक को काफी समय प्रतिबंधित साहित्य के रूप में जन जन तक पहुँचने से रोका गया।  इसके बाद जब यह पुस्तक बाज़ार में आयी और सामान्य जनमानस ने नाथूराम को पढ़ा तो कुछ लोगों की धारणा बदली। लोगों को आज तक गाँधी की गाथा ही पता थी।  मगर गाँधी वध क्यों ? जैसे ही लोगों ने पढ़ी उन के विचार बदले। यह विचार अभिव्यक्ति की आज़ादी का हिस्सा ही हैं।

कुछ लोगों को मोहनदास करमचंद गाँधी महात्मा लगता है तो कुछ लोगों को नाथूराम का कदम देश हित में लगता है। यह दो विचारधाराओं की बात है।  आप अपनी विचारधारा किसी पर यदि जबरन थोपेंगे तो इसे अभीव्यक्ति की आज़ादी का हनन ही माना जाएगा। कुछ लोगों का मानना है कि गोडसे का आज़ादी की जंग में कोई सहभाग नहीं था। जबकि सच यह है कि गोडसे और सावरकर सहित भगत सिंह जैसे क्रांतिकारी कांग्रेस की विचारधारा से सहमत नहीं थे। जैसे को तैसा उत्तर देने वाले इन क्रांतिकारियों को कांग्रेस ने गरम दल की उपाधि दी हुई थी।

यदि कांग्रेस की नीतियां सभी लोग अपनाते तो अंग्रेज़ों का खज़ाना ना लूटा जाता , चौरी – चौरा काण्ड ना होता , जनरल डायर को मौत के घाट ना उतारा जाता , सुभाष चंद्र बोस को विदेशी सरज़मीं पर रहकर आज़ादी के लिए संघर्ष ना करना पड़ता।नाथूराम गोडसे को सिरफिरा व्यक्ति कहने वाले लोगों को पता होना चाहिए कि जब गोडसे पर अदालत में मुकदमा चल रहा था। उस वक़्त उसकी दलीलें सुनने के लिए हज़ारों लोग अदालत में आते थे और गोडसे के तथ्यों पर गली – चौराहों पर चर्चा भी होती थी।

उस समय के समाचार पत्र उठा कर अगर देखेंगे तो नाथूराम गोडसे की दलीलों से भरे होते थे। अदालत में नाथूराम गोडसे के दिए हुए बयान को आज तक सार्वजिनिक नहीं किया गया है।  इसकी वजह क्या है ? गोडसे किसी के दिलों के महात्मा का हत्यारा हो सकता है , मगर गोडसे के अपने पुस्तको में वर्णित अपने विचारधारा के अनुसार उसने उस व्यक्ति का वध किया है जिसने हमेशा एक धर्म विशेष की चापलूसी की थी।  किसी की नज़र में गोडसे हत्यारा हो सकता है मगर अपनी नज़र में वह अपने आपको आज़ादी की जंग का एक बहादुर सिपाही ही मानता था.।

गाँधी को अच्छी तरह से पढ़ने वालों ने कभी गोडसे को पढ़ने की ज़ेहमत ही नहीं उठाई। इसी वजह से कोई गोडसे को हिन्दू आतंकवादी कहता है तो कोई सिरफिरा हत्यारा बताता है।  जबकि गोडसे आज़ादी की जंग में गरम दल का सदस्य मात्र था। जो लोग गोडसे का रिश्ता राष्ट्रिय स्वयं सेवक संघ से जोड़ते हैं उन्हें पता होना चाहिए कि गोडसे कभी संघ का सदस्य था ही नहीं। संघ को बदनाम करने की साज़िश के तहत ही गोडसे और संघ का नाता जोड़ा जाता रहा है। खैर कुछ भी हो गोडसे को पढ़े बगैर गाँधी को महात्मा साबित करना एक तरफ़ा निर्णय लेने के सामान ही है।

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