भारत की आज़ादी का कड़वा सच – (भाग – ५२ )

(कर्ण हिंदुस्तानी )
गाँधी – नेहरू – जिन्नाह के इर्दगिर्द घूम रही थी राजनीती।
ब्रिटिश सरकार के नुमाइंदे समझ चुके थे कि भारत को आज़ादी मिलते देख नेतागण आपसी युद्ध में उलझ चुके हैं और इसी उलझन के चलते भारत और पाकिस्तान  का भविष्य कभी भी उज्जवल नहीं होगा। यदि पाकिस्तान का निर्माण हो गया तो भारत और पाकिस्तान हमेशा के लिए आपस में लड़ते रहेंगे।  दोनों मुल्कों का सैनिक खर्च का एक बड़ा हिस्सा आपसी जंग में खर्च होगा। ब्रिटिश हुकूमत दूरदर्शी तो थी ही , साथ ही साथ धूर्त राजनीती खेलने में भी माहिर थी। यही वजह थी कि ब्रिटिश सरकार नेहरू – जिन्नाह और गाँधी को आपस में लड़ते देख चुप थी।  हुकूमत ने नेहरू को स्वतंत्र भारत का प्रधानमंत्री होने का स्वप्न दिखाया तो जिन्नाह को एक नए देश का जन्मदाता होने का झुनझुना हाथ में थमा दिया।  इन दोनों से अलग गाँधी को अंग्रेज़ों ने महात्मा साबित करने में कोई कसार नहीं छोड़ी थी। बात बात पर अन्न त्याग कर अनशन पर बैठने वाले गाँधी के अहिंसक आंदोलन से गोरी सरकार तंग तो आ गई थी , मगर क्रांतिकारियों के हमले से बचने का एक सुकून भी गोरी सरकार के चेहरे पर साफ़ झलकता था।
भारतीय जनता पर बल प्रयोग करते समय अंग्रेज़ अधिकारी हिचकते नहीं थे।  मगर जब कभी कोई क्रांतिकारी भगत सिंह बन कर पलट वार करता था तो भारत से लेकर लंदन तक गोरी सरकार की चूलें हिल जातीं थीं। यही वजह थी कि अंग्रेज़ों ने गाँधी के अहिंसक आंदोलन को मूक  सहमति दी हुई थी।  गाँधी अथवा नेहरू पर कभी कारावास के दौरान अत्याचार नहीं किये गए।  जबकि क्रांतिकारियों पर चरम सीमा तक ज़ुल्म ढाये जाते थे। गाँधी के असहयोग आंदोलन अथवा नमक आंदोलन के दौरान भी गाँधी समर्थकों पर गोरी सरकार की पुलिस ने लाठी चार्ज किया किन्तु गाँधी पर कोई भी बल प्रयोग नहीं किया गया। इसकी एक ही वजह थी कि गोरी सरकार गाँधी को हर हाल में मसीहा बनाना चाहती थी। एक ऐसा मसीहा जो हिंसा को सिरे से नकारता हो और जनता के लिए पूजनीय हो। गाँधी इन सब में एक दम फिट भी बैठते थे। जबकि नेहरू गाँधी से अलग सत्ता के मद में डूब जाने को आतुर थे।  सत्ता के सिवा उनको कुछ भी नज़र नहीं आता था।  सरदार वल्लभ भाई पटेल को नेहरू की यह सत्ता लोलुपता कतई पसंद नहीं थी।  पटेल का मानना था कि पहले सभी रियासतों को एक किया जाए और उसके बाद पाकिस्तान का गठन यदि हो सके टाला जाए।  जिन्नाह को उसकी ज़िद्द छोड़ने को कहा जाए। मगर जिन्नाह – नेहरू और गाँधी की तिकड़ी के सामने पटेल भी हताश ही नज़र आते थे।
(जारी …….)
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